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जिसे तुम अपना समझ रहे हो, वह शरीर तो तुम्हारा हैं ही नही!
मुझे ऐसे शिष्यों की आवश्यकता नहीं हैं, जिनमें कायरता हो, विरोध सहने की क्षमता न हो.
मुझे वे शिष्य अत्यंत प्रिय हैं, जो अपने स्तर के अनुसार सेवा कार्य में रत हैं
साधनाओं के नियम
ध्यान रहे, केवल वही महत्वपूर्ण है
मंत्र-तंत्र-यंत्र विज्ञान
धरती पर ही होता हैं स्वर्ग और नर्क
सिकंदर - गुरु के प्रति सच्ची भक्ति
गुरु मंत्र से सिद्धि
गुरु सेवा
जैसी रही भावना जिसकी
16 कलाये
कामाख्या का तांत्रिक सम्मलेन
India ke सर्वश्रेष्ठ एवं ऋषियों में भी परम वन्दनीय ऋषिगण
गुरु की महत्ता
mere GURU JI ki kirpa ho jaye to kuchh bhi asmbhav nahi
निखिलेश्वरानंद श्री गुरुचरणों में समर्पित एक शिष्य का प्रेमाश्रु है
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