Monday, September 20, 2010

गुरु की क्रिया

गुरु की क्रिया
तीन लोक नव खण्ड में गुरु ते बड़ा न कोय।
करता करे न कर सकें, गुरु करे सो होय।।



पुराने समय की बात हैं, एक व्यक्ति अत्यंत ही निर्धन था, बड़ी मुश्किल से अपना जीवनयापन कर पाता था। परिवार में वह, पत्नी और कन्या के अतिरिक्त एनी कोई नहीं था।

समय के साथ कन्या धीरे-धीरे युवा होती गई, जब उसके विवाह का समय आया, तो उसके सामने यह परेशानी आई कि : “पुत्री के विवाह हेतु धन कहाँ से लाया जायें।“

ऐसे समय में किसी परिचित से उसे ज्ञात हुआ, कि कुछ दुरी पर ही एक श्रेष्ठ, तपस्वी व्यक्तित्व का निवास हैं, और वह उसकी समस्या का समाधान कर सकता हैं, उसे उसके परिचितों ने भी यही सलाह दी कि वह उस दिव्य व्यक्तित्व से जाकर अपनी समस्या के समाधान हेतु उनसे निवेदन करें।

जब अत्यंत ही व्यथित हो गया, तो उसने उस व्यक्तित्व के पास जाने का निर्णय कर लिया।
वह अपने घर से उसके आश्रम की ओर प्रस्थान करता हैं और उस उच्चकोटि के व्यक्तित्व के आश्रम में पहुँच जाता हैं। वहाँ वह उन गुरुदेव के कुटिया में जाता हैं, तो देखता हैं कि वह एक कोने में बैठे हैं, व गुरुदेव उसे देखकर उसे आने का कारण पूछते हैं।
मनुष्य अपनी व्यथा उनसे कहता हैं।

पूरी बात सुनकर गुरुदेव मुस्कुराते हुए उसे कहते हैं : “वत्स! वो मेरी चरणपादुका हैं, उसे तुम अपने सिर पर रखकर ले जाओ।“

मनुष्य को समझ नहीं आया कि यह पादुका भला मुझे इतनी धन-सम्पदा कैसे प्रदान कर सकती हैं, जिससे मैं अपनी पुत्री का विवाह कर सकूँ, मगर उनके आदेश कि अवहेलना करना उनके बस में नहीं था।
उस मनुष्य ने उन गुरु महाराज जी को प्रणाम किया और उनकी चरण पादुका को अपने सिर पर रखकर अत्यंत ही व्यथित मन से अपने घर को प्रस्थान किया।
कुछ समय की यात्रा के पश्चात ही उसे सामने से एक जत्था आता दिखाई दिया। उसमें एक राजा कहीं से युद्ध जीतकर बहुत सा धन-सम्पदा लेकर लौट रहा था, जब उसने उस मनुष्य को यूँ चरण पादुका लेकर जाते देखा तो सिपाहियों को आदेश देकर बुलाया।
राजा : “तुम कौन हो और तुम्हारे सिर पर यह किसकी चरण पादुका हैं।“
मनुष्य राजा को देखकर ही डर गया था, उसने उसे सारी कहानी कह सुनाई।
सारी बात सुनाने के बाद राजा ने खुश होकर कहा : “तुम मेरे साथ लायी हुयी सारी धन-सम्पदा को लिए जाओ, और अपनी कन्या का विवाह किसी संपन्न घराने में करना और खुद का जीवन भी श्रेष्ठता से व्यतीत करना और यह चरण पादुका मुझे दे दो।“
मनुष्य वह चरण पादुका राजा को दे देता हैं और उसे अपने सिर पर रख लेता हैं। मनुष्य उससे कारण जानना चाहता हैं, तो वह बताता हैं कि ये चरणपादुका जिनकी हैं, वे मेरे गुरुदेव हैं! आज तक जो भी मैं प्राप्त कर सका, उसके पीछे परोक्ष-अपरोक्ष दोनों ही प्रकार से वही ही हैं। यह ज्ञान, चिंतन, ध्यान, धारणा, समाधि, मंत्र-तंत्र-यंत्र, आदि सब कुछ तो उन्हीं की दें हैं। मैं तो मिटटी का लौंदा हूँ, मुझे तो किसी प्रकार का कोई ज्ञान नहीं हैं।

सीख : “गुरु क्या करता हैं? कब करता हैं? क्यूँ करता हैं? इसका ज्ञान सिर्फ गुरु को ही होता हैं, शिष्य या आम व्यक्ति इस बात को नहीं समझ सकते हैं। काल का एक चक्र बीतने पर ही मनुष्य को गुरु के हर कदम का एहसास होता हैं। तब तक मनुष्य किसी भी प्रकार से किसी बात को समझने में उतना ही समर्थ होता हैं, जितना कि उसके अंदर ज्ञान और चेतना की आग होती हैं, और शिष्य का यह धर्म हैं कि वह इस आग को हमेशा जलाते और बढ़ाते रहे, क्यूंकि जिस दिन यह आग धधकना बंद हो जायेगी, उस दिन वह शिष्यता के सारे स्तरों से नीचे उतरना शुरू कर देता हैं।“

आपका ही.
राज निखिल.
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