Friday, August 26, 2011

Maya dasi sant ki sankat ki shir Taj

माया दासी संत की साकट की शिर ताजसाकुट की सिर मानिनी, संतो सहेली लाज 

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि माया तो संतों के लिए दासी की तरह होती है पर अज्ञानियों का ताज बन जाती है। अज्ञानी लोग का माया संचालन करती है जबकि संतों के सामने उसका भाव विनम्र होता है।

गुरू का चेला बीष दे, जो गांठी होय दामपूत पिता को मारसी, ये माया के काम

संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते है। कि शिष्य अगर गुरू के पास अधिक संपत्ति देखते हैं तो उसे विष देकर मार डालते है। और पुत्र पिता की हत्या तक कर देता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-अगर देखा जाये तो पैसे की औकात केवल जेब तक ही रहती है जबकि अज्ञानी लोग इसे सदैव अपने सिर पर धारण किए रहती है।। वह बात-बात में अपने धनी होने का प्रमाणपत्र लेकर आ जाते हैं। अपनी तमाम प्रकार डींगें हांकते है। परमार्थ से तो उनका दूर दूर तक नाता नहीं होता। जो लोग ज्ञानी हैं वह जेब मैं पैसा है यह बात अपने दिमाग में लेकर नहीं घूमते। आवश्यकतानुसार उसमें से पैसा खर्च करते हैं पर उसकी चर्चा अधिक नहीं करते। आजकल जिसके भी घर जाओं वह अपने घर के फर्नीचर, टीवी, फ्रिज, वीडियो और कंप्यूटर दिखाकर उनका मूल्य बताना नही भूलता और इस तरह प्रदर्शन करता है जैसे कि केवल उसी के पास है अन्य किसी के पास नहीं। कहने का अभिप्राय है कि लोगों के सिर पर माया अपना प्रभाव इस कदर जमाये हुए है कि उनको केवल अपनी भौतिक उपलब्धि ही दिखती है।
लोग आपस में बैठकर अपने धन और आर्थिक उपलब्धियों पर ही चर्चा करते हैं। अगर कोई गौर करे और सही विश्लेषण करे तो लोग नब्बे फीसदी से अधिक केवल पैसे के मामलों पर ही चर्चा करते हैं। अध्यात्म चर्चा और सत्संग तो लोगों के लिए फ़ालतू कि चीज है । इसके विपरीत जो ज्ञानी और सत्संगी हैं वह कभी भी अपनी आर्थिक और भौतिक उपलब्धियों पर अहंकार नहीं करते। न ही अपने अमीर होने का अहसास सभी को कराते हैं।

वैसे जिस तरह आजकल धार्मिक संस्थानों में संपतियों को लेकर विवाद और मारामारी मची है उसे देखते हुए यह आश्चर्य ही मानना चाहिये कि कबीरदास जी ने भी बहुत पहले ही ऐसा कोई घटनाक्रम देखा होगा इसलिए ही चेताते हैं कि गुरुओं को अधिक संपति नहीं रखना चाहिये। आजकल अनेक संत इस सन्देश कि उपेक्षा कर संपति संग्रह में लगे हुए हैं इसलिए ही विवादों में भी घिरे रहते हैं।

Dhan ki mahta

दान की महत्ता

सैकडों हाथों से एकत्रित करो और हजारों हाथों से बांटो। यह कथन अथर्ववेदसे लिया गया है। वास्तव में, यदि हमें कुछ पाना है, तो कुछ त्याग भी करना पडेगा। यह आध्यात्मिक नियम भी है कि दिया हुआ कभी व्यर्थ नहीं जाता है, बल्कि वह कई गुणा बढकर वापस हमारे पास आ जाता है। पाने का पूरक है दान

यदि हम कुछ पाना चाहते हैं, तो पहले दान देना होगा। यह नियम प्रकृति के साथ भी लागू होता है। उदाहरण के लिए यदि हमें अन्न प्राप्त करना है, तो पहले हमें पृथ्वी को बीज के रूप में दान देना पडता है। बाद में यही बीज हमें अन्न-भंडार के रूप में प्राप्त होता है। यदि वृक्षों से हमें फल प्राप्त करना है, तो पहले खाद-पानी एवं सेवा के रूप में कुछ न कुछ त्याग करना ही पडता है। जीवन के सभी क्षेत्रों में यह नियम समान रूप से लागू होता है। महापुरुषों के अनुसार, जो कुछ भी आपको हासिल करना है, कुछ वही दूसरों को देकर देखिए। सच पूछिए, तो जितना आपने दिया है, उससे कई गुणा ज्यादा आपको मिल जाएगा। चिंतक का दृष्टिकोण

हमारे ऋषि-मुनि भी यही मानते हैं कि जितना अधिक हम दूसरों को देते हैं, उतना ही हम पाते भी हैं। यहां प्रसिद्ध भारतीय चिंतक कृष्णमूर्ति का एक दृष्टांत है। एक व्यक्ति ईश्वर के बहुत समीप था। एक बार ईश्वर ने उससे कहा, एक गिलास जल देना। वह व्यक्ति जल लेने कुछ दूर निकल गया। एक घर में जल मांगने पहुंचा, तो वहां एक सुन्दर युवती को देखा। युवती को देखते ही उसे प्रेम हो गया। यहां तक कि उसने उससे विवाह भी कर लिया। दंपत्तिके बाल-बच्चे भी हो गए। एक बार जोरों की वर्षा हुई। नदी-नाले उमड पडे। अपने घर-परिवार के साथ वह भी जब डूबने लगा, तो उसने ईश्वर से प्रार्थना की, प्रभु मुझे बचा लो। ईश्वर ने कहा, मेरा एक गिलास जल कहां है?

एक ईसाई चिंतक ने इस आध्यात्मिक प्रक्रिया को स्पष्ट करने के लिए एक बडी अच्छी घटना को उद्धृत किया है। एक राजा हाथी पर सवार होकर जा रहा था। एक भिक्षुक ने उसे देखा और वह उसके पीछे दौडने लगा, राजा मुझे कुछ दान दो। राजा ने कहा, पहले तुम मुझे कुछ दो। भिक्षुक ने सोचा यह कैसा राजा है, जो एक भिखारी से दान लेना चाहता है! उसने क्रोध में चावल के चार दाने उसके ऊपर फेंक दिए। राजा ने उसके भिक्षा-पात्र में सोने के कई दाने डाल दिए। भिक्षुक ने आश्चर्य से अपने पात्र में पडे सोने के चावलों को देखा और सोचा, मुझे अपने सभी दान को राजा को दे देना चाहिए था। सबसे बडा धर्म

हमारे धर्मग्रंथों में भी कहा गया है कि दान से बडा कोई धर्म नहीं-न हि दानात्परो धर्म:। गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस में लिखा है-जिस किसी विधि से दान दो, उससे आपका कल्याण ही होगा।

जेनकेन बिधिदीन्हें।

दान करईकल्यान।।

वेदों ने बहुत पहले ही दान की महत्ता बताई थी। ऋग्वेद में अनेक दान-संबंधी ऋचाएंहैं। उदाहरण के लिए दान नहीं देने वाले मनुष्य कभी सुखी नहीं हो सकते हैं। [ऋक्-10/117/1]

ऐसा कोई धर्म नहीं है, जिसमें दान की महत्ता को रेखांकित नहीं किया गया हो। ईसाई धर्म से लेकर इस्लाम, बौद्ध, जैन, पारसी आदि सभी धर्म एक स्वर से दान की महत्ता का गुणगान करते हैं।

इस्लाम में अनुयायियों के लिए आय का दसवां हिस्सा खैरात के रूप में देने का प्रावधान है। इसी तरह टेथर के रूप में ईसाई धर्म में भी आय का दशम भाग चर्च को नियमित रूप से देने की प्रथा है। बाइबल में भी दान के महत्व को रेखांकित किया गया है। उसके अनुसार, लेने से अधिक देना हमारे लिए सदैव हितकारी होता है। इसलिए यदि हमें आध्यात्मिक साधना करनी है, तो हमें अल्प ही सही, दान जरूर देना चाहिए।

Monday, August 22, 2011

Shri Sanyukt Lakshmi Ganesh prayog


Shri Sanyukt Lakshmi Ganesh prayog






धन आज के युग का सबसे बड़ा सत्य बन गया हैं और क्यों न हो , ऋग वेद मेभी कहा गया हैं की सभी गुण तो केबल मात्र लक्ष्मी के आधीन रहते हैं,मतलब बहुत ही साफ़ हैं एक उच्चस्थ ग्रन्थ कार भी कहता हूँ,मैं भी वही, मेरा ज्ञान भी बही ,पर हे लक्ष्मी केबल तुम्हारी कृपा न पाने के कारण,आज मुझे को कोई नहीं पूछता , कोई सम्मान नहीं देता . यह तो बात ग्रंथो की हैं पर दिन प्रति दिन मे जो हालात हम सभी के सामने हैं उसमे तो कैसे सामना किया जाये यही आ ज की बड़ी समस्या हैं .


कुछ तो इसी में परेशान हैं की लक्ष्मी आये तो सही ,कैसे करे दिन प्रति दिनके खर्चे का सामना .


कुछ की आवश्यकता से अधिक धन उपार्जन की क्षमता हैं पर वह भी कहते रहते हैं कि पैसा हाँथ में रुकता नहीं हैं . क्या यह बात सही हैं??, हाँ कुछ हद तक क्योंकि लक्ष्मी तो चंचला हैं उन्हें कौन रोक सकता हैं .


लक्ष्मी को माँ माँ कह कर आरती करते रहने से आपका ज्यादा नुक्सान हो सकता हैं सदगुरुदेव भगवान् ने कितनी बार इन गोपनीय बातों को अपने लेखो में लिखा हैं की भूल कर भी मैय्या मैय्या कह कर कभी भी लक्ष्मी उपासना न करो क्योंकि जीवन में एक समय के बाद माँ को तो हमेशा देना पड़ता हैं . खैर इस संबंधमे सदगुरुदेव के लेख आप स्वयं ही पढ़े. तब क्या करे की आती हुए लक्ष्मी घर में ही स्थापित रहे , और चलिए स्थापित तो हो गयी पर यदि वह सही ढंग से खर्च न की जा रही हो तो भी मुश्किल क्योंकि तब तो हम मात्र चौकीदार जैसे हो गए न . सदगुरुदेव कहतेहैं लक्ष्मी पुत्र बनना ठीक हैं पर लक्ष्मी दास बनना ठीक नहीं हैं


तब इसको खर्च करते समय बुद्धि का उपयोग करे . यहाँ सद्बुद्धि का उपयोग ज्यादा उचित रहता.


तब भगवान् गणेश का आगमन होता हैं जो विघ्न हर्ता तो हैं ही , पर विघ्न कर्ता. भी हैं.


वह अपने वरद हस्त से सब हमारे अनुकूल कर देते हैं , हम सभी साधक केबल कहने के लिए ही गणेश उपासना केबल खानापूर्ति के लिए साधना के पहले कर लेते हैं . पर हम में से कितने जानते हैं, जब तक मूलाधार चक्र सही न हो तब तक जीवन में न तो साधना में ठीक से बैठना नहीं आ पायेगा, आसन स्थिर हो ही नहीं हो सकता हैं न ही काम भावना पर नियंत्रण हो सकता हैं आज समाज में जो भी काम भावना की अतिरेकता हो रही हैं वह इसी चक्र की गडबडी का नतीजा हैं. हमारे ऋषियों ने कितने सोच कर इस चक्र का नाम दिया हैं मूल + आधार .


और भगवान् गणेश इसी चक्र के देवता हैं , इसलिए इस चक्र को गणेश चक्र भी कहा जाता हैं.वेसे भी किसी भी काम को शुरू करने के लिए श्री गणेश करना भी कहा जाता हैं.


जहाँपर लक्ष्मी के साथ वरदायक भगवान् श्री गणेश का अंकुश रहे वहां आप ही सोच सकते हैं ...शुभता . संपत्ति , श्रेष्ठ ता , बिघ्न रहित जीवन .. सब ही कुछ तो होगा ,


पर कैसे हो यह संभव ..


हर साधक को अपने साधना पूजन में लक्ष्मी और गणेश को स्थान देना ही चाहिए ही .


मंत्र : श्रीं ॐ गं


इसके लिए विशेष नियम नहीं हैं पर आप इस मंत्र की एक माला जप अपनी पूजा में शामिल कर ले. तो धीरे धीरे आप स्वयं इस मंत्र का प्रभाव देख सकते हैं


आज के लिए बस इतना ही
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Money is becoming the biggest truth now a days, and why not it to be, Rig-Veda’ says that all the qualities lies in lakshmi, and one great writer also said that now I am the same , my gyan also as it is, but o goddess lakshmi without your blessing , where am I today ?, no one respect me , no one want to meet me. but these are the writings in books. Every days what we are facing everybody already knew that. How to face the current situation is the biggest problem.


Some are worried how to earn enough/sufficient so that our at least daily minimum needs would be fulfilled.


On the other hand some has the qualities to earn more than enough ,they are also complaining that they are not able to save money , Is it true ??? yes on some level , since lakshmi Is not stationery , she is always moving. who can stop her?.


Those who are continuously doing aarti with saying maiyya maiyya (mother mother ) actually hurting himself, why?, Sadgurudev ji very clearly mentioned that we should not worship goddess lakshmi as a mother since to mother we have to always give after a certain point,, what Sadgurudev more said in this connection , you can read/listen in his divine writings . but is there any way so that lakshmi can be finally made stationery in our home. and suppose if goddess lakshmi becomes totally stationery in our home and if that is not wise fully used than this also become headache. Than we are just a guard and nothing else.


Sadgurudev used to say that its nice to be son of lakshmi instead of lakshmi das.


Then how can be wisely used , here I would like to say through “sadbuddhi”.


Than Bhagvaan Ganesh comes into picture.


Through his blessing everything’s comes to positive for us, he is both obstruction creator and obstruction destroyer., most of us just do the Ganesh sadhana just for formality in the beginning of any sadhana. But how many of us knows that until mooladhar chakra Is properly functioning , till than sitting for any sadhana is not properly possible ,(as needed). And our sexual desire also can not be controlled , now a days whatever/everywhere we are watching is the over excess of this sexual unbalance /sensuous gratification is the result of not properly function of this mooladhar chakra. Think about a minute how wisely our rishis , gave this chakra a name mool +aadhar.( foundation of basic root ).


Bhagvaan Ganesh is the lord of this chakra , that’s why this chakra is also known as Ganesh chakra,, and whenever any new work starts we say we have to “shri Ganesh “ of that work .


Where with lakshmi Bhagvaan Ganesh controlled our buddhi than every thing positivity happens there.


But how that can be possible????.


We should have a place of Ganesh and lakshmi poojan in our daily poojan/sadhana .


Mantra : Shreem om gam .


There is no special rules have to be follow, only one round of rosary /one mala is sufficient and slowly slowly you can see the result.


This is enough for today.

Friday, August 19, 2011

KaLika Astak


कालिकाष्टक (शंकराचार्य विरचितम)



* ध्यान *
गलद्रक्त मुण्डावली कण्ठमाला 
माहाघोर रावा सुदँष्ट्रा कराला।
विवस्त्रा श्मशनालया मुक्तकेशी
महाकाल कामा कुला कालिकेयम।।१।। 

भुजेवामयुग्मे शिरोसिं दधाना
वरं दक्षयुग्मेभयं वै तथैव । 
सुमध्यापी तुंगस्थना भारनम्रा
लसद्रक्त सृक्कद्वया सुस्मितास्या।।२।। 

शवद्वन्दकर्णा वतंसा सुकेशी
लसत्प्रेतपाणीं प्रयुक्तैक कांची। 
शवाकारमँचाधीरुढा शिवाभि-
श्चतुर्दिक्षु शब्दयामानाभिरेजे।।३।। 

      **स्तुती** 
विरन्च्यादिदेवास्त्रयते गुणात्रिम्
समाराध्य कालीँ प्रधाना बवुभु। 
अनादिं सुरादीं मखादिं भवादिं 
स्वरूपं त्वदियं न विन्दन्ती देवा।।१।।

जगन्मोहिनियम् तु वाग्वादिनियम्
सुह्रिद्पोषिणी शत्रु संहारणियम्।  
वचस्तम्भनियम् किमुच्चाटनियम्
स्वरुपं त्वदियं न विन्दन्ती देवा।।२।।

इयं स्वर्गदात्री पुन: कल्पवल्ली 
मनोजास्तु कामान्यथार्थ प्रकुर्यात।
तथाते कृतार्था भवन्तीति नित्यम
स्वरुपं त्वदियं न विन्दन्ती देवा।।३।। 

सुरापानमत्ता शुभक्तानुरक्ता 
लसत्पूतचित्ते सदाविर्भवस्ते। 
जपध्यान् पूजासुधाधौतपंका 
स्वरुपं त्वदियं न विन्दन्ती देवा।।४।। 

चिदानन्दकन्दं हसन्मन्दमन्दं 
शरच्चन्द्र कोटीप्रभापुन्ज बिन्वम्। 
मुनीनां कवीनां हृदि ध्योतयन्तं 
स्वरुपं त्वदियं न विन्दन्ती देवा।।५।।        

माहामेघकाली सुरक्तापि शुभ्रा
कदचिद्विचित्रा कृतिर्योगमाया। 
न वाला न वृद्धा न कामातुरापि 
स्वरुपं त्वदियं न विन्दन्ती देवा।।६।। 

क्षमास्वपराधं माहागुप्तभावं 
मायालोकमध्ये प्रकाशीकृतं यत्। 
तव ध्यानपुतेन चापल्यभावात्
स्वरुपं त्वदियं न विन्दन्ती देवा।।७।। 

यदी ध्यान युक्तं पठेध्यो मनुष्य 
स्तदा सर्वलोके विशालो भवेच्च। 
गृहे चाष्टसिद्धिर्मृते चापि मुक्ती-
स्वरुपं त्वदियं न विन्दन्ती देवा।।८।। 

A tribute to Mother..Jay Mahakali Jay Jagat Janani Bhagavati Mata

apradh kashma stotra





अपराध क्षमापन स्तोत्र



न मन्त्रं नो यन्त्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो
न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथा:।
न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं
परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम्॥1॥


विधेरज्ञानेन द्रविणविरहेणालसतया
विधेयाशक्यत्वात्तव चरणयोर्या च्युतिरभूत्।
तदेतत् क्षन्तव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे
कुपुत्रो जायेत क्व चिदपि कुमाता न भवति॥2॥


पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहव: सन्ति सरला:
परं तेषां मध्ये विरलतरलोहं तव सुत:।
मदीयोऽयं त्याग: समुचितमिदं नो तव शिवे
कुपुत्रो जायेत क्व चिदपि कुमाता न भवति॥3॥


जगन्मातर्मातस्तव चरणसेवा न रचिता
न वा दत्तं देवि द्रविणमपि भूयस्तव मया।
तथापि त्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुषे
कुपुत्रो जायेत क्व चिदपि कुमाता न भवति॥4॥


परित्यक्ता देवा विविधविधिसेवाकुलतया
मया पञ्चाशीतेरधिकमपनीते तु वयसि।
इदानीं चेन्मातस्तव यदि कृपा नापि भविता
निरालम्बो लम्बोदरजननि कं यामि शरणम्॥5॥


श्वपाको जल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरा
निरातङ्को रङ्को विहरित चिरं कोटिकनकै:।
तवापर्णे कर्णे विशति मनुवर्णे फलमिदं
जन: को जानीते जननि जपनीयं जपविधौ॥6॥


चिताभस्मालेपो गरलमशनं दिक्पटधरो
जटाधारी कण्ठे भुजगपतिहारी पशुपति:।
कपाली भूतेशो भजति जगदीशैकपदवीं
भवानि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदम्॥7॥


न मोक्षस्याकाड्क्षा भवविभववाञ्छापि च न मे
न विज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुन:।
अतस्त्वां संयाचे जननि जननं यातु मम वै
मृडानी रुद्राणी शिव शिव भवानीति जपत:॥8॥


नाराधितासि विधिना विविधोपचारै:
किं रुक्षचिन्तनपरैर्न कृतं वचोभि:।
श्यामे त्वमेव यदि किञ्चन मय्यनाथे
धत्से कृपामुचितमम्ब परं तवैव॥9॥


आपत्सु मग्न: स्मरणं त्वदीयं
करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि।
नैतच्छठत्वं मम भावयेथा:
क्षुधातृषार्ता जननीं स्मरन्ति॥10॥


जगदम्ब विचित्रमत्र किं परिपूर्णा करुणास्ति चेन्मयि।
अपराधपरम्परापरं न हि माता समुपेक्षते सुतम्॥11॥


मत्सम: पातकी नास्ति पापघन्ी त्वत्समा न हि।
एवं ज्ञात्वा महादेवि यथा योग्यं तथा कुरु.

Gurumata........ Image:सिद्धाश्रम निखिल वाणी

Guru Aavhan stotra


गुरु आह्वान् स्तोत्र

१ 
पूर्णम् सतान्यै परिपूर्ण रुपम्।  
गूरुर्वै सतान्यम् दीर्घो वतान्यम्।। 
आवर्विताम् पूर्ण मदैव पुण्यम्। 
गुरुर्वै शरण्यम् गूरुर्वै शरण्यम्।।
       त्वमेव माता च........... 
२ 
न जानामी योगम न जानामी ध्यानम्। 
न मन्त्रम् न तन्त्रम् योगम् कृयान्वै।। 
न जानामी पुर्णम् न देहम न पूर्वम। 
गुरुर्वै शरण्यम् गूरुर्वै शरण्यम्।।
       त्वमेव माता च........... 
३ 
अनाथो दरिद्रो जरा रोग युक्तो। 
माहाक्षिण दीनम् सदा ज्याड्य वक्त्र:।। 
विपत्ती प्रविष्टम् सदाह्म् भजामी। 
गुरुर्वै शरण्यम् गूरुर्वै शरण्यम्।।
       त्वमेव माता च........... 
४ 
त्वम् मातृ रुपम् पितृ स्वरुपम्। 
आत्म स्वरुपम् प्राण स्वरुपम्।। 
चैतन्य रुपम् देव दिवन्त्रम्। 
गूरुर्वै शरण्यम् गूरुर्वै शरण्यम्।।  
        त्वमेव माता च...........
५ 
त्वम् नाथ पूर्णम् त्वम् देव पुर्णम्। 
आत्मम् च पूर्णम् ज्ञानम् च पूर्णम्।। 
अहम् त्वाम् प्रपध्ये सदह्म् भजामी। 
गूरुर्वै शरण्यम् गूरुर्वै शरण्यम्।।
           त्वमेव माता च........... 
६ 
मम अश्रु अर्घ्यम् पुष्पम् प्रसुनम्। 
देहम् च पुष्पम् शरणम् त्वमेवम्।। 
जीवो$वदाम् पूर्ण मदैव रुपम्। 
गूरुर्वै शरण्यम् गूरुर्वै शरण्यम्।। 
           त्वमेव माता च...........
आवाहयामि        आवाहयामि। 
शरण्यम् शरण्यम् सदाह्म् शरण्यम्।। 
त्वम् नाथ मेवम् प्रपध्ये प्रशन्नम्। 
गूरुर्वै शरण्यम् गूरुर्वै शरण्यम्।। 
         त्वमेव माता च...........
८ 
न तातो न माता न बन्धुर्न भ्राता।
न पुत्रो न पुत्री न भृत्योर्न भर्ता।।
न जाया न वित्तम न वृत्तिर्ममेवम्।
गूरुर्वै शरण्यम् गूरुर्वै शरण्यम्।।
         त्वमेव माता च...........
९ 
आवध्य रुपम् अश्रु प्रवाहम्। 
धीयाम् प्रपध्ये हृदयम् वदान्यै।। 
देह त्वमेवम् शरण्यम् त्वमेवम्। 
गुरुर्वै शरण्यम् गुरुर्वै शरण्यम्।।
         त्वमेव माता च........... 
१० 
गुरुर्वै शरण्यम् गुरुर्वै शरण्यम्।
गुरुर्वै शरण्यम् गुरुर्वै शरण्यम्।।
एको हि नाथम् एको हि शब्दम्। 
गुरुर्वै शरण्यम् गुरुर्वै शरण्यम्।।
         त्वमेव माता च...........
११ 
कान्ताम् न पूर्व वदान्यै वदान्यम्। 
को$ह्म् सदान्यै सदाह्म् वदामि।। 
न पूर्वम् पतिर्वै पतिर्वै सदा$ह्म्। 
गुरुर्वै शरण्यम् गुरुर्वै शरण्यम्।।
         त्वमेव माता च...........
 १२ 
न प्राणो वदार्वै न देहम् नवा$है। 
न नेत्रम न पूर्व सदा$ह्म् वदान्यै।। 
तुच्छम् वदाम् पूर्व मदैव तुल्यम्। 
गुरुर्वै शरण्यम् गुरुर्वै शरण्यम्।।
         त्वमेव माता च...........
१३ 
पूर्वो न पूर्व न ज्ञानम् न तुल्यम्। 
न नारी नरम् वै पतिर्वै न पत्न्यम्।। 
को कत् कदा कुत्र कदैव तुल्यम्। 
गुरुर्वै शरण्यम् गुरुर्वै शरण्यम्।।
        त्वमेव माता च...........
१४ 
गुरुर्वै गतान्यम् गुरुर्वै शतान्यम्। 
गुरुर्वै वदान्यम् गुरुर्वै कथान्यम्।। 
गुरुमेव रुपम् सदा$ह्म् भजामी। 
गुरुर्वै शरण्यम् गुरुर्वै शरण्यम्।।
        त्वमेव माता च...........
१५ 
आत्र वदाम् अश्रु वदैव रुपम्। 
ज्ञानम् वदान्यै परिपूर्ण नित्यम्।। 
गुरुर्वै वज्राह्म् गुरुर्वै भजाह्म्। 
गुरुर्वै शरण्यम् गुरुर्वै शरण्यम्।।
        त्वमेव माता च........... 
१६ 
त्वमेव माता च पिता त्वमेव। 
त्वमेव वन्धुश्च सखा त्वमेव।। 
त्वमेव विध्या द्रविणम् त्वमेव। 
त्वमेव सर्वम् मम देव देव।।

Siddhashram Panchak


सिद्धाश्रम पञ्चक

गुरूत्वम् सदैवम् पुर्णा तदैवम्।
भाग्येन् देवो भवदेव नित्यम्।।
अहो भवाम् परीपूर्ण सिन्धुम्।
गुरूत्वम् शरण्यम् गुरुत्वम शरण्यम्।।
             त्वमेव माता च पिता त्वमेव..........

त्वम् मातृ रुपम् पितृ स्वरुपम्।
बन्धु स्वरुपम् आत्म स्वरुपम्।।
चैतन्य रुपम् पूर्णत्व रुपम्।
गुरूत्वम् शरण्यम् गुरुत्वम् शरण्यम्।।  
           त्वमेव माता च पिता त्वमेव......... 

न तातो न माता न बन्धुर्न भ्राता।
न पुत्रो न पुत्री न भृत्योर्न भर्ता।।
न जाया न वित्तम न वृत्तिर्ममेवम्।
गतिस्त्वम् मतिस्त्वम् गुरूत्वम् शरण्यम्।।
             त्वमेव माता च पिता त्वमेव.........

अनाथो दरिद्रो जरा रोग युक्तो।
महाक्षीण दीन सदा जाड्यवक्ता।।
विपत्ती प्रविष्ट सदाहम् भजामी।
गुरूत्वम् शरण्यम् गुरूत्वम् शरण्यम्।।
             त्वमेव माता च पिता त्वमेव.........

त्वम् मातृ रुपम् त्वम् पितृ रुपम्।
सदैवम् सदैवम् कृपा सिन्धु रुपम्।।
त्वमेवम् शरण्यम् त्वमेवम् शरण्यम्।
गुरूत्वम् सदैवम् गुरूत्वम् शरण्यम्।।
             त्वमेव माता च पिता त्वमेव......... 

न जानामी मन्त्रम्  न जानामी तन्त्रम्।
न योगम् न पूजा न ध्यानम् वदामी।।
न जानामी चैतन्य ज्ञानम् स्वरुपम्।
एकोही रुपम् गुरूत्वम् शरण्यम्।।
            त्वमेव माता च पिता त्वमेव.........

एकोही नामम् एकोही कार्यम्।
एकोही ध्यानम् एकोही ज्ञानम्।।
आज्ञा सदैवम् परिपाल्यन्तिम्।
त्वमेवम् शरण्यम् त्वमेवम् शरण्यम्।।
              त्वमेव माता च पिता त्वमेव.........

त्वम् ज्ञात रुपम् त्वम् अज्ञात रुपम्।
मम देह रुपम् मम प्राण रुपम्।।
पूर्णत्व देहम मम प्राण सदेवम्।
त्वमेवम् शरण्यम् गुरूत्वम् शरण्यम्।। 
              त्वमेव माता च पिता त्वमेव.........