Monday, September 29, 2014

shree arjun krit durga stavan श्री अर्जुन कृत श्रीदुर्गा स्तवन






श्री अर्जुन-कृत श्रीदुर्गा-स्तवन

विनियोग - ॐ अस्य श्रीभगवती दुर्गा स्तोत्र मन्त्रस्य श्रीकृष्णार्जुन स्वरूपी नर नारायणो ऋषिः, अनुष्टुप् छन्द, श्रीदुर्गा देवता, ह्रीं बीजं, ऐं शक्ति, श्रीं कीलकं, मम अभीष्ट सिद्धयर्थे जपे विनियोगः।

ऋष्यादिन्यास-


श्रीकृष्णार्जुन स्वरूपी नर नारायणो ऋषिभ्यो नमः शिरसि, अनुष्टुप् छन्दसे नमः मुखे, श्रीदुर्गा देवतायै नमः हृदि, ह्रीं बीजाय नमः गुह्ये, ऐं शक्त्यै नमः पादयो, श्रीं कीलकाय नमः नाभौ, मम अभीष्ट सिद्धयर्थे जपे विनियोगाय नमः सर्वांगे।

कर न्यास - ॐ ह्रां अंगुष्ठाभ्याम नमः, ॐ ह्रीं तर्जनीभ्यां स्वाहा, ॐ ह्रूं मध्यमाभ्याम वषट्, ॐ ह्रैं अनामिकाभ्यां हुं, ॐ ह्रौं कनिष्ठाभ्यां वौष्ट्, ॐ ह्रः करतल करपृष्ठाभ्यां फट्।

अंग-न्यास -ॐ ह्रां हृदयाय नमः, ॐ ह्रीं शिरसें स्वाहा, ॐ ह्रूं शिखायै वषट्, ॐ ह्रैं कवचायं हुं, ॐ ह्रौं नैत्र-त्रयाय वौष्ट्, ॐ ह्रः अस्त्राय फट्।



ध्यान -

सिंहस्था शशि-शेखरा मरकत-प्रख्या चतुर्भिर्भुजैः,

शँख चक्र-धनुः-शरांश्च दधती नेत्रैस्त्रिभिः शोभिता।

आमुक्तांगद-हार-कंकण-रणत्-कांची-क्वणन् नूपुरा,

दुर्गा दुर्गति-हारिणी भवतु नो रत्नोल्लसत्-कुण्डला।।



मानस पूजन - ॐ ह्रीं दुं दुर्गायै नमः लं पृथिव्यात्मकं गन्धं समर्पयामि। ॐ ह्रीं दुं दुर्गायै नमः हं आकाशात्मकं पुष्पं समर्पयामि। ॐ ह्रीं दुं दुर्गायै नमः यं वाय्वात्मकं धूपं घ्रापयामि। ॐ ह्रीं दुं दुर्गायै नमः रं वहृ्यात्मकं दीपं दर्शयामि। ॐ ह्रीं दुं दुर्गायै नमः वं अमृतात्मकं नैवेद्यं निवेदयामि। ॐ ह्रीं दुं दुर्गायै नमः सं सर्वात्मकं ताम्बूलं समर्पयामि।



श्रीअर्जुन उवाच -

नमस्ते सिद्ध-सेनानि, आर्ये मन्दर-वासिनी,

कुमारी कालि कापालि, कपिले कृष्ण-पिंगले।।1।।

भद्र-कालि! नमस्तुभ्यं, महाकालि नमोऽस्तुते।

चण्डि चण्डे नमस्तुभ्यं, तारिणि वर-वर्णिनि।।2।।

कात्यायनि महा-भागे, करालि विजये जये,

शिखि पिच्छ-ध्वज-धरे, नानाभरण-भूषिते।।3।।

अटूट-शूल-प्रहरणे, खड्ग-खेटक-धारिणे,

गोपेन्द्रस्यानुजे ज्येष्ठे, नन्द-गोप-कुलोद्भवे।।4।।

महिषासृक्-प्रिये नित्यं, कौशिकि पीत-वासिनि,

अट्टहासे कोक-मुखे, नमस्तेऽस्तु रण-प्रिये।।5।।

उमे शाकम्भरि श्वेते, कृष्णे कैटभ-नाशिनि,

हिरण्याक्षि विरूपाक्षि, सुधू्राप्ति नमोऽस्तु ते।।6।।

वेद-श्रुति-महा-पुण्ये, ब्रह्मण्ये जात-वेदसि,

जम्बू-कटक-चैत्येषु, नित्यं सन्निहितालये।।7।।

त्वं ब्रह्म-विद्यानां, महा-निद्रा च देहिनाम्।

स्कन्ध-मातर्भगवति, दुर्गे कान्तार-वासिनि।।8।।

स्वाहाकारः स्वधा चैव, कला काष्ठा सरस्वती।

सावित्री वेद-माता च, तथा वेदान्त उच्यते।।9।।

स्तुतासि त्वं महा-देवि विशुद्धेनान्तरात्मा।

जयो भवतु मे नित्यं, त्वत्-प्रसादाद् रणाजिरे।।10।।

कान्तार-भय-दुर्गेषु, भक्तानां चालयेषु च।

नित्यं वससि पाताले, युद्धे जयसि दानवान्।।11।।

त्वं जम्भिनी मोहिनी च, माया ह्रीः श्रीस्तथैव च।

सन्ध्या प्रभावती चैव, सावित्री जननी तथा।।12।।

तुष्टिः पुष्टिर्धृतिदीप्तिश्चन्द्रादित्य-विवर्धनी।

भूतिर्भूति-मतां संख्ये, वीक्ष्यसे सिद्ध-चारणैः।।13।।

।। फल-श्रुति ।।

यः इदं पठते स्तोत्रं, कल्यं उत्थाय मानवः।

यक्ष-रक्षः-पिशाचेभ्यो, न भयं विद्यते सदा।।1।।

न चापि रिपवस्तेभ्यः, सर्पाद्या ये च दंष्ट्रिणः।

न भयं विद्यते तस्य, सदा राज-कुलादपि।।2।।

विवादे जयमाप्नोति, बद्धो मुच्येत बन्धनात्।

दुर्गं तरति चावश्यं, तथा चोरैर्विमुच्यते।।3।।

संग्रामे विजयेन्नित्यं, लक्ष्मीं प्राप्न्नोति केवलाम्।

आरोग्य-बल-सम्पन्नो, जीवेद् वर्ष-शतं तथा।।4।।



प्रयोग विधि -

उक्त स्तोत्र ‘महाभारत’ के ‘भीष्म पर्व’ से उद्धृत है।

१॰ इसकी साधना भगवती के मन्दिर अथवा घर में एकान्त में करनी चाहिये। ‘घी’ के दीपक में बत्ती के लिये अपनी नाप के बराबर रूई के सूत को 5 बार मोड़कर बटे तथा बटी हुई बत्ती को कुंकुम से रंगकर भगवती के सामने दीपक जलायें।

नवरात्र या सर्व सिद्धि योग से पाठ का प्रारम्भ करें कुल 9 या 21 दिन पाठ करें तथा प्रतिदिन 9 या 21 बार आवृत्ति करें। पाठ के बाद हवन करें। लाल वस्त्र तथा आसन प्रशस्त है। साधना काल में ब्रह्मचर्य का पालन करें।

इससे सभी प्रकार की बाधाएं समाप्त होती है तथा दरिद्रता का नाश होता है। शासकीय संकट, शत्रु बाधा की समाप्ति के लिये अनुभूत सिद्ध प्रयोग है।



२॰ नित्य दुर्गा-पूजा (सप्तशती-पाठ) के बाद उक्त स्तव के ३१ पाठ १ महिने तक किए जाएँ। या

३॰ नवरात्र काल में १०८ पाठ नित्य किए जाएँ, तो उक्त “दुर्गा-स्तवन” सिद्ध हो जाता है।

mahishasur mardani strotam महिषासुरमर्दिनि स्तोत्रम



महिषासुरमर्दिनि स्तोत्रम

अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुते
गिरिवरविन्ध्यशिरोऽधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते ।
भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १ ॥
सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते
त्रिभुवनपोषिणि शङ्करतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते
दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २ ॥

अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्ब वनप्रियवासिनि हासरते
शिखरि शिरोमणि तुङ्गहिमलय शृङ्गनिजालय मध्यगते ।
मधुमधुरे मधुकैटभगञ्जिनि कैटभभञ्जिनि रासरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ३ ॥

अयि शतखण्ड विखण्डितरुण्ड वितुण्डितशुण्द गजाधिपते
रिपुगजगण्ड विदारणचण्ड पराक्रमशुण्ड मृगाधिपते ।
निजभुजदण्ड निपातितखण्ड विपातितमुण्ड भटाधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ४ ॥

अयि रणदुर्मद शत्रुवधोदित दुर्धरनिर्जर शक्तिभृते
चतुरविचार धुरीणमहाशिव दूतकृत प्रमथाधिपते ।
दुरितदुरीह दुराशयदुर्मति दानवदुत कृतान्तमते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ५ ॥

अयि शरणागत वैरिवधुवर वीरवराभय दायकरे
त्रिभुवनमस्तक शुलविरोधि शिरोऽधिकृतामल शुलकरे ।
दुमिदुमितामर धुन्दुभिनादमहोमुखरीकृत दिङ्मकरे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ६ ॥

अयि निजहुङ्कृति मात्रनिराकृत धूम्रविलोचन धूम्रशते
समरविशोषित शोणितबीज समुद्भवशोणित बीजलते ।
शिवशिवशुम्भ निशुम्भमहाहव तर्पितभूत पिशाचरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ७ ॥

धनुरनुषङ्ग रणक्षणसङ्ग परिस्फुरदङ्ग नटत्कटके
कनकपिशङ्ग पृषत्कनिषङ्ग रसद्भटशृङ्ग हताबटुके ।
कृतचतुरङ्ग बलक्षितिरङ्ग घटद्बहुरङ्ग रटद्बटुके
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ८ ॥

सुरललना ततथेयि तथेयि कृताभिनयोदर नृत्यरते
कृत कुकुथः कुकुथो गडदादिकताल कुतूहल गानरते ।
धुधुकुट धुक्कुट धिंधिमित ध्वनि धीर मृदंग निनादरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ९ ॥

जय जय जप्य जयेजयशब्द परस्तुति तत्परविश्वनुते
झणझणझिञ्झिमि झिङ्कृत नूपुरशिञ्जितमोहित भूतपते ।
नटित नटार्ध नटी नट नायक नाटितनाट्य सुगानरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १० ॥
अयि सुमनःसुमनःसुमनः सुमनःसुमनोहरकान्तियुते
श्रितरजनी रजनीरजनी रजनीरजनी करवक्त्रवृते ।
सुनयनविभ्रमर भ्रमरभ्रमर भ्रमरभ्रमराधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ११ ॥
सहितमहाहव मल्लमतल्लिक मल्लितरल्लक मल्लरते
विरचितवल्लिक पल्लिकमल्लिक झिल्लिकभिल्लिक वर्गवृते ।
शितकृतफुल्ल समुल्लसितारुण तल्लजपल्लव सल्ललिते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १२ ॥
अविरलगण्ड गलन्मदमेदुर मत्तमतङ्ग जराजपते
त्रिभुवनभुषण भूतकलानिधि रूपपयोनिधि राजसुते ।
अयि सुदतीजन लालसमानस मोहन मन्मथराजसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १३ ॥
कमलदलामल कोमलकान्ति कलाकलितामल भाललते
सकलविलास कलानिलयक्रम केलिचलत्कल हंसकुले ।
अलिकुलसङ्कुल कुवलयमण्डल मौलिमिलद्बकुलालिकुले
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १४ ॥
करमुरलीरव वीजितकूजित लज्जितकोकिल मञ्जुमते
मिलितपुलिन्द मनोहरगुञ्जित रञ्जितशैल निकुञ्जगते ।
निजगणभूत महाशबरीगण सद्गुणसम्भृत केलितले
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १५ ॥
कटितटपीत दुकूलविचित्र मयुखतिरस्कृत चन्द्ररुचे
प्रणतसुरासुर मौलिमणिस्फुर दंशुलसन्नख चन्द्ररुचे
जितकनकाचल मौलिमदोर्जित निर्भरकुञ्जर कुम्भकुचे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १६ ॥
विजितसहस्रकरैक सहस्रकरैक सहस्रकरैकनुते
कृतसुरतारक सङ्गरतारक सङ्गरतारक सूनुसुते ।
सुरथसमाधि समानसमाधि समाधिसमाधि सुजातरते ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १७ ॥
पदकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योऽनुदिनं सुशिवे
अयि कमले कमलानिलये कमलानिलयः स कथं न भवेत् ।
तव पदमेव परम्पदमित्यनुशीलयतो मम किं न शिवे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १८ ॥
कनकलसत्कलसिन्धुजलैरनुषिञ्चति तेगुणरङ्गभुवम्
भजति स किं न शचीकुचकुम्भतटीपरिरम्भसुखानुभवम् ।
तव चरणं शरणं करवाणि नतामरवाणि निवासि शिवम्
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १९ ॥
तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं सकलं ननु कूलयते
किमु पुरुहूतपुरीन्दु मुखी सुमुखीभिरसौ विमुखीक्रियते ।
मम तु मतं शिवनामधने भवती कृपया किमुत क्रियते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २० ॥
अयि मयि दीन दयालुतया कृपयैव त्वया भवितव्यमुमे
अयि जगतो जननी कृपयासि यथासि तथानुमितासिरते ।
यदुचितमत्र भवत्युररीकुरुतादुरुतापमपाकुरुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २१ ॥

Saturday, September 6, 2014

kahi Vidhi karu upasana काही विधि करूं उपासना

काही विधि करूं उपासना

उपासना का मतलब है नजदीक जाना... इतना नजदीक की उसके अन्दर जाना, विस्मृत कर देना अपने-आप को, भूल जाना अपने स्वत्व को।

और यह भूलने का भाव, एकाकार हो जाने का भाव प्रेम के द्वारा ही सम्भव है...प्रेम के द्वारा ही जीने और मरने का सलीका आता है, प्रेम के द्वारा ही मर मिटने की उपासना सम्भव है।

और जो मरा नहीं, वह क्या ख़ाक जिया, जिसने विरह के तीर खाए ही नहीं, वह गुरु से क्या एकाकार हो सकेगा, क्या ख़ाक उपासना कर सकेगा -


किसूं काम के थे नहीं, कोई न कौडी देह।
गुरुदेव किरपा करी भाई अमोलक देह ॥
सतगुरु मेरा सुरमा, करे सबद की चोट।
मारे गोला प्रेम का, ढहे भरम का कोट ॥
सतगुरु सबदी तीर है कियो तन मन छेद।
बेदरदी समझे नहीं, विरही पावे भेद

प्रेम, एक धधकता हुआ अंगारा है, जिस पर मोह की राख पड़ गई है... सदगुरु उस पर फूंक मारता है, राख उड़ जाती है, और नीचे से उपासना का अंगार चमकता हुआ निकल आता है।

इसलिए तो खाली प्रार्थना से कुछ भी होना नहीं है, कोरी आंख मूंद लेने से उपासना में सफलता प्राप्ति नहीं हो सकती, इसके लिए जरूरी है गुरु के पास जाना, उनकी उठी हुई बाहों में अपने-आप को समा लेना...तभी आनन्द के अंकुर फुटेंगे, उपासना का राजपथ प्राप्त होगा, और तभी से एकाकार होने की क्रिया संपन्न होगी।

गुरु कहै सो कीजिये, करै सो कीजै नांहि ।
चरनदास की सीख सुन, यही राख मन मांहि ॥
जप- तप- पूजा - पाठ सब, गुरु चरनण के मांहि ।
निस दिन गुरु सेवा करै, फिरू उपासना कांहि ॥
का तपस्या उपासना, जोग जग्य अरु दान ।
चरण दास यों कहत है, सब ही थोथे जान ॥
गुरु ही जप - तप - ध्यान है, गुरु ही मोख निर्वाण ।
चरणदास गुरु नाम ते, नांहि उपासन ज्ञान ॥

श्राद्ध और पितरेश्वर तर्पण srad aur pitesvar tarpan

श्राद्ध और पितरेश्वर तर्पण


मातृ पितृ चरण कमलेभ्यो नमः
सर्व पितरेश्वर चरण कमलेभ्यो नमः


प्रत्येक शुभ कार्य के प्रारम्भ में माता-पिता,पूर्वजों को नमस्कार प्रणाम करना हमारा कर्तव्य है, हमारे पूर्वजों की वंश परम्परा के कारण ही हम आज यह जीवन देख रहे हैं, इस जीवन का आनंद प्राप्त कर रहे हैं।
इसलिए हमारे ऋषियों ने वर्ष में एक पक्ष को पितृपक्ष का नाम दिया, जिस पक्ष में हम अपने पितरेश्वरों का श्राद्ध,तर्पण, मुक्ति हेतु विशेष क्रिया संपन्न कर उन्हें अर्ध्य समर्पित करते हैं। यदि कोई कारण से उनकी आत्मा को मुक्ति प्रदान नहीं हुई है तो हम उनकी शांति के लिए विशिष्ट कर्म करते है इसीलिए आवश्यक है -


श्राद्धऔर
पितरेश्वर तर्पण मुक्ति विधान-साधना
पितरेश्वर दोष निवारण विधान-साधना


श्राद्ध का अर्थ है - श्रद्धापूर्वक कुछ देना या स्वयं को विनम्रतापूर्वक श्रद्धज्ञ व्यक्त करना। अपने मृत पूर्वजों के लिए कृतज्ञता ज्ञापन करना ही श्राद्ध है, क्योंकि भारतीय मान्यता के अनुसार मृत जीवात्मा विभिन्न लोकों में भटकती हुई दुःखदायी योनियों में प्रविष्ट होती है, तथा अनन्त दुःखों को भोगती है... । शास्त्रीय परम्परानुसार श्राद्ध के माध्यम से दिवंगत आत्मा को शान्ति प्राप्त होती है।

पितरेश्वर का सामान्य अर्थ यह माना गया है की व्यक्ति विशेष के वे पूर्वज जिन्होंने इस संसार को त्याग दिया है लेकिन प्रेत शब्द का भी अपभ्रंश पितर है अर्थात वे आत्माएं जिन्हें मुक्ति नहीं मिलाती। वे आत्माएं प्रेत योनी में होने के कारण सामान्य भाषा में पितृ अवश्य कहा जाता है लेकिन यह आवश्यक नहीं की इन पितरों का अथवा प्रेतों का आपसे कोई सीधा सम्बन्ध हो। ये प्रेत आत्माएं किसी भी बालक स्त्री, कमजोर व्यक्ति पर अधिकार जमा सकती है। जिसके चलते मरणांतक पीडा होती है। ऐसी प्रेत बाधा से मुक्ति पितृ-पक्ष में, श्राद्ध पक्ष में इस लेख में दी गई है।

परिवार की शुभचिन्तक आत्माएं: भोग अथवा लालसा के कारण आत्मा की मुक्ति नहीं हो पाती है और इसी कारण जब तक कोई नया शरीर न मिले तब तक भटकते रहना एक प्रकार से उसकी विवशता होती है। परन्तु कई बार आत्मा की मुक्ति अपने पारिवारिक दायित्वों की पूर्ति के कारण भी नहीं हो पाती है। ऐसे कई कारण हो सकते है, जैसे उसने अपनी वसीयत कहीं गुप्त रूप से रख दी हो अथवा धन संचय कर कहीं छिपा दिया हो और अपने परिवार जनों को देना चाहता हो। ये भी हो सकता है, की परिवार जनों के ऊपर कोई विपत्ति आने वाली हो अथवा पुत्री का विवाह जहां तय किया जा रहा हों वह परिवार ठीक न हो, आदि बातों को अपने परिवार जनों को बताना चाहती है। इस दशा में रहकर उस मृतात्मा को जब तक की इन बातों को अपने परिवार जनों से नही कह देती तब तक वह निरंतर एक दबाव में रहती है, उसकी मुक्ति नहीं हो पाती, इसलिए अपनी परिचित मृतात्माओं से सम्पर्क साधक के लिए सदैव कल्याणकारी होता है। पितरों के आशीर्वाद प्राप्ति हेतु पितरेश्वर साधना का इसलिए भारतीय चिन्तन में प्रावधान है।

सृष्टि का क्रम जिस प्रकार निर्धारित समयानुसार संपन्न होता रहता है, उसी प्रकार मनुष्य के निर्धारण भी विभिन्न निश्चित कर्मों से गुजरता हुआ जन्म से मृत्यु और पुंसवन से जन्म की ओर गतिशील होता है।

विश्वनियन्ता के इस निर्धारित क्रम के अनुसार ही हमारे ऋषियों-महर्षियों ने सम्पूर्ण मानव-जीवन को अर्थात गर्भ में आगमन से लेकर जन्म और मृत्यु तक, पूर्ण कालचक्र को विभिन्न खंडों में विभाजित कर दिया है। उन्होंने ऐसा इसलिए किया, जिससे मनुष्य एक अनुशासित और सुव्यवस्थित तरीके से अपने जीवन को व्यतीत करे और साथ ही प्रत्येक कार्य के साथ, वे कार्य, जो मानव-जीवन को प्राप्त करने और सुरक्षित रखने के दृष्टिकोण से अत्यधिक महत्वूर्ण होते है, उनके हेतु परम पिता परमेश्वर के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित कर, उनकी प्रसन्नता और आशीर्वाद प्राप्त कर सके।

सनातन धर्म में इस निर्धारित कार्य को 'संस्कार' के नाम से संबोधित किया गया है। बहुत ही महत्वपूर्ण होते हैं ये संस्कार योग्य पुत्र अथवा पुत्री की प्राप्ति हेतु। गर्भ में आगमन के समय 'पुंसवन संस्कार' सम्पन्न किया जाता है, तो जन्म लेने के उपरांत 'नामकरण', 'चूडामणि संस्कार' संपन्न किया जाता है, अर्थात पांच से पन्द्रह वर्ष की अवस्था तक उसका 'उपनयन संस्कार' कर, उसे द्वीज बनाकर पूर्ण विद्यार्जन का अधिकार प्रदान किया जाता है।

यौवन का पदार्पण होने पर 'विवाह संस्कार' किया जाता है और इस प्रकार विभिन्न संस्कारों से गुजरता हुआ व्यक्ति जब वृद्धावस्था को प्राप्त कर अपने जर्जर और रोगग्रस्त शरीर का त्याग कर किसी अन्य शरीर को धारण करने के लिए प्रस्थान करता है, तो उसके द्वारा त्यागे गए शरीर को हिंदू धर्मानुसार अग्नि में समर्पित कर 'कपाल क्रिया संस्कार' सम्पन्न किया जाता है।

अत्यधिक व्यवस्थित है हमारी सनातन धर्म की संस्कृति और अत्यधिक उदार व सहृदय भी। मृत्यु के बाद भी हमारा रिश्ता उस हुतात्मा से जुडा रहता है, समाप्त नहीं होता और उसके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने के लिए ही बनाया गया है 'श्राद्ध' नामक संस्कार।
श्राद्ध का महत्त्व सर्वविदित है। इसके बारे में कोई आवश्यक नहीं है की विस्तृत विवेचना की जाय, किन्तु यह बहुत ही कम लोगों को ज्ञात होगा, की श्राद्ध बारह प्रकार के होते है: -
  1. नित्य श्राद्ध - जो श्राद्ध प्रतिदिन किया जाय, वह नित्य श्राद्ध है। तिल, धान्य, जल, दूध, फल, मूल, शाक आदि से पितरों की संतुष्टि के लिए प्रतिदिन श्राद्ध करना चाहिए।

  2. नैमित्तिक-श्राद्ध - 'एकोद्दिष्ट-श्राद्ध' के नाम से भी इसे जाना जाता है। इसे विधिपूर्वक सम्पन्न कर विषम संख्या में ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए।

  3. काम्य-श्राद्ध - जो श्राद्ध कामना युक्त होता है, उसे काम्य श्राद्ध कहते है।

  4. वृद्धि-श्राद्ध - यह श्राद्ध धन-धान्य तथा वंश-वृद्धि के लिए किया जाता है, इसे उपनयन संस्कार सम्पन्न व्यक्ति को ही करना चाहिए।

  5. सपिन्डन श्राद्ध - इस श्राद्ध को सम्पन्न करने के लिए चार शुद्ध पत्र लेकर उनमे गंध, जल और तिल मिला कर रखा जाता है, फिर प्रेत पात्र का जल पितृ पात्र में छोडा जाता है। चारों पात्र प्रतीक होते है - प्रेतात्मा, पितृत्मा, देवात्मा और उन अज्ञात आत्माओं के, जिनके बारे में हमे ज्ञान नही है।

  6. पार्वण श्राद्ध - अमावास्या अथवा किसी पर्व विशेष पर किया गया श्राद्ध पार्वण-श्राद्ध कहलाता है।

  7. गोष्ठ-श्राद्ध - गौओं कर्मांग गर्भादान सिमान्तोय जाने वाला श्राद्ध कर्म गोष्ठ-श्राद्ध कहलाता है।

  8. शुद्धयर्थ-श्राद्ध - विद्वानों की संतुष्टि, पितरों की तृप्ति, सुख-संपत्ति की प्राप्ति के निमित्त ब्राहमणों द्वारा कराया जाने वाला कर्म शुद्धयर्थ-श्राद्ध है

  9. कर्मांग-श्राद्ध - यह श्राद्ध गर्भाधान, सिमान्तोन्नयन तथा पुंसवन संस्कार के समय सम्पन्न होता है।

  10. दैविक-श्राद्ध - देवाताओं के निमित्त घी से किया गया हवानादी कार्य, जो यात्रादी के दिन संपन्न किया जाता है, उसे दैविक-श्राद्ध कहते है।
  11. औपचारिक-श्राद्ध - यह श्राद्ध शरीर की वृद्धि और पुष्टि के लिए किया जाता है।
  12. सांवत्सरिक-श्राद्ध - यह श्राद्ध सभी श्राद्धों में श्रेष्ठ कहलाता है, और इसे मृत व्यक्ति की पुण्य तिथि पर सम्पन्न किया जाता है। इसके महत्त्व का आभास 'भविष्य पुराण' में वर्णित इस बात से हो जाता है, जब भगवान सूर्य स्वयं कहते है - 'जो व्यक्ति सांवत्सरिक-श्राद्ध नहीं करता है, उसकी पूजा न तो मै स्वीकार करता हूं न ही विष्णु, ब्रम्हा, रुद्र और अन्य देवगण ही ग्रहण करते है।' अतः व्यक्ति को पर्यंत करके प्रति वर्ष मृत व्यक्ति की पुण्य तिथि पर इस श्राद्ध को सम्पन्न करना ही चाहिए।
जो व्यक्ति माता-पिता का वार्षिक श्राद्ध नहीं करता है, उसे घोर नरक की प्राप्ति होती है, और अंत में उसका जन्म 'सूकर योनी' में होता है। श्राद्ध पक्ष में व्यक्ति को अपने घर में निर्धारित तिथि के अनुसार श्राद्ध कर्म सम्पन्न करना ही चाहिए।
कुछ व्यक्तियों के सम्मुख यह प्रश्न होगा कि उन्हें अपने माता पिता की मृत्यु की तिथि ज्ञात नहीं है, तो वे किस दिन श्राद्ध सम्पन्न करें?
- ऐसे व्यक्ति को श्राद्ध पक्ष की अमावास्या को श्राद्ध कर्म सम्पन्न करना चाहिए। सौभाग्यवती स्त्रियों का श्राद्ध यथा - मां, दादी, परदादी आदि का श्राद्ध मातृ नवमी को करना चाहिए।
श्राद्ध कर्म केवल मृत माता-पिता के लिए ही सम्पन्न किया जाता है, ऐसी बात नहीं है, यह कर्म तो मृत पूर्वजों के प्रति आदर का सूचक है, और उनके आशीर्वाद को प्राप्त कराने का सुअवसर है, अतः श्राद्ध कर्म प्रत्येक साधक और पाठक को सम्पन्न करना ही चाहिए।

Aryan culture protector, आर्य संस्कृति के रक्षक


आर्य संस्कृति के रक्षक



प्रिया आत्मीय बंधुओं,




समय का चक्र अपनी गति से चलता रहता है। उस गति में हर क्षण नित्य नवीन होता है। पुराने क्षण से अलग कुछ नया करने का आह्वान करता है। जीवन को लम्बी यात्रा न मानकर क्षण-क्षण जीने में ही आनन्द है और जो जीवन को भार समझाते हैं, यह कि जीवन में केवल बाधाएं और परेशानियां ही हैं तो उनके लिए यह भार बढ़ता ही जाता है। जो साधक है, जो शिष्य है वह अपने मन से एक-एक कर भार का बोझ फेकता रहता है। अपने मार्ग में आने वाले कांटे पत्थरों को स्वयं हटाता है। स्वयं के प्रयत्नों से इस यात्रा में एक विशेष आनन्द की अनुभूति होती है। इस आनन्द में पूर्ण आत्म साक्षात्कार कराने हेतु सदगुरुदेव हर समय ह्रदय में विराजमान रहते ही हैं, केवल आवश्यकता इस बात की है की हम मन मंथन हर समय करते रहे। अपने आप को समय के तराजू पर तोलते रहें, समाज आवश्यक है लेकिन समाज की चिंताओं में इतना भी अधिक जकड नहीं जाएं कि समाज हमारे मन पर हावी हो जाएं।




जीवन के अज्ञान अंधकार को मिटाने के लिए यह आवश्यक है कि हमें अपने अन्दर विखण्डन प्रक्रिया प्रारम्भ करनी ही पड़ेगी। इसके लिए कोई समय मूहूर्त की आवश्यकता नहीं है। सदगुरुदेव कहते हैं कि जीवन का आधार विचार, विवेक और वैराग्य है। साधक का प्रथम कर्तव्य विचारशील होना है और यह विचार विवेक से युक्त होने चाहिए। लाखों प्रकार की बातें हम सुनते हैं, लाखों प्रकार के मंत्र हैं, लाखों प्रकार के अन्य कार्य हैं, लाखों प्रकार के मोह है। लेकिन जब हम अपने विवेक स्थान, जिसका प्रारम्भ ह्रदय से है, जिसका भाव आज्ञा चक्र मस्तिष्क में है उस विवेक स्थान पर सदगुरुदेव स्थापित हो जाएं तो श्रेष्ठ विचार ही उत्पन्न होते हैं। विचार ही महाशक्ति है, विचार ही आद्या दुर्गा शक्ति है, महाकाली है, महाविद्याएं है, विचार ही भाग्य का निर्माण करती है। विचार का तात्पर्य है संकल्प और चिंतन। जब चिंतन के साथ संकल्प प्रारम्भ होता है तो जीवन की समस्याएं लघु लगने लगती हैं और इसी से जीवन में एक निःस्पृह योगी का भाव आता है। आप साधक है, शिष्य है और शक्ति के उपासक हैं। सदगुरुदेव रूपी शिव आपके साथ है फिर जीवन में चिंता करने की आवश्यकता नहीं है।




जब हम गुरु से मिलते है तो हमारा नया जन्म होता है और जीवन का हर क्षण एक उज्जवल भविष्य की सम्भावना लेकर आता है। हर घड़ी एक महान मोड़ का समय हो सकती है। क्या पता जिस क्षण को हम समझकर बरबाद कर रहे हैं, वही हमारे लिए अपनी झोली में सुंदर सौभाग्य की सफलता लाया हो। समय की चूक पश्चाताप की हूक बन जाती है। जीवन में कुछ करने की इच्छा रखने वालों को चाहिए कि वे अपने किसी भी ऐसे कर्तव्य को भूलकर भी कलपर न टालें, जो आज किया जाना चाहिए। आज के मन के लिए आज का ही दिन निश्चित है और हमें हर समय वर्त्तमान में ही जीवन जीना है।




गुरुदेव चाहे तो एक क्षण में वरदान देकर जीवन को परिवर्तित कर सकते हैं लेकिन गुरुदेव तो जीवन को तपाते है, साधक में अग्नि तत्व का संचार करते हैं और जब यह अग्नि तत्व संचालित हो जाता है तो साधक आत्म ज्ञान का पहला अध्याय पूरा करता है। इसलिए सदगुरुदेव सदैव संस्कृति और संस्कार पर बल देते हैं। संस्कार एक दिन में ही जाग्रत हो जाते हैं इसे बदलने के लिए मन के हजार-हजार बंधनों को तोड़ना पङता हैं।




जब नदी कई धाराओं में बट जाती है तो वह नदी न बनकर एक नहर बन जाती है और नहरें समुद्र को पा नहीं सकती हैं। वे छोटे-छोटे टुकडों में बटी हुई अपने अस्तित्व को समाप्त कर देती हैं और केवल स्थान भर के लिए थोडी उपयोगी रह जाती है। शिष्य भी नदी की तरह ही जब वह ज्ञान के मार्ग पर जीवन की यात्रा करता है तो उसमें दृढ़ निश्चय संकल्प होना आवश्यक है क्योंकि उसका लक्ष्य यह होना चाहिए कि मुझे अपने सागर रुपी गुरु से मिलना है। गुरु ही विराट है उसी में अपने अस्तित्व का मिलन करना है।




सिद्धाश्रम साधक परिवार की इस यात्रा में जब मैं कई शिष्यों को अपने मार्ग से थोडा भटकते हुए देखता हूं आश्चर्य होता है मन व्यथित होता है, जब लोगों को सदगुरु के नाम पर ढोंग करने वाले शिष्यों के सामने नमन करते देखता हूं, जब कुछ शिष्यों को क्षणिक, भौतिक सुविधाओं के लिए ऐसे लोगों के पास भटकते देखता हूं जो उन्हें जीवन की सारी भौतिक बाधाओं को पूर्ण करने का छलावा दिखाते हैं। कोई तथाकथित गुरु गडा धन बताने की बात करता है तो कोई तथाकथित गुरु भूत-प्रेत भगाने का दावा करता है तो कोई मां काली के दर्शन कराने का भ्रम दिखाता है। इन छोटे-छोटे स्थानिक गुरुओं को देखकर आश्चर्य होता है कि सदगुरु के शिष्य ऐसे भ्रम में कैसे पड़ जाते हैं? और मेरे सामने इनका उत्तर ना मिलने पर सदगुरुदेव निखिल के सामने बैठकर प्रार्थना करता हूं कि हे! गुरुदेव यह कैसी लीला है तो गुरुदेव कहते हैं कि चिंता करने की कोई बात नहीं है घासफूस, खतपतवार, मौसमी फल थोड़े समय के लिए सबको अच्छे लगते हैं लेकिन खतपतवार, मौसमी फल-फूल का जीवन स्थाई नहीं रहता। जो शिष्य इन मार्गों पर जा रहे हैं वे वापस सिद्धाश्रम की मुख्य धारा में अवश्य आयेंगे।




इसलिए मुझे आज यह उदघोष करना है कि आप सिद्धाश्रम साधक परिवार के प्रहरी हैं। सदगुरुदेव के मानस पुत्र हैं, दीक्षा प्राप्त शिष्य हैं, आर्य संस्र्कुती के रक्षक हैं तो आपका यह कर्तव्य कि सदगुरुदेव के नाम पर पड़ने वाली इस खतपतवार को समाप्त कर दें। इन ढोंगियों को ऐसी सजा दे कि पूरा समाज देख सके और पत्थर और हीरे में अनुभव अन्तर कर सकें। कृत्रिम चमक कुछ समय के लिए लुभा सकती है लेकिन हीरा तो हीरा ही है। हमारे सदगुरुदेव तो हीरे से भी अधिक मूल्यवान, सागर से भी

विशाल, हिमालय से भी उंचे, शिवरूपी निखिल हैं और जिन्हें प्राप्त करना सहज है।




इसी उद्देश्य से यह अंक भगवती मां दुर्गा को समर्पित है, महाविद्याओं को समर्पित है जिनकी साधना आराधना कर हम जीवन में भौतिक एवं आध्यात्मिक उन्नति पूर्ण रूप से प्राप्त कर सकते हैं।




इस बार बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी में फिर महाशिवरात्रि पर्व "हर-हर महादेव" का उदघोष करेंगे। शिव और शक्ति से अपने जीवन को भर देंगे क्योंकि हमारा एक ही मूल सुत्र है -








एकोही नामं एकोहि कार्यं, एकोहि ध्यानं एकोहि ज्ञानं ।


आज्ञा सदैवं परिपालयन्ति; त्वमेवं शरण्यं त्वमेव शरण्यं ॥





आपका अपना


नन्द किशोर श्रीमाली


मंत्र-तंत्र-यंत्र विज्ञान पत्रिका , फरवरी 2006

Mantra power and influence - their rules मंत्र शक्ति और प्रभाव - उनके नियम

मंत्र शक्ति और प्रभाव - उनके नियम

मंत्र शक्ति आज के युग में भी पूर्ण सत्य एवं प्रत्येक कसौटी पर खरी हैहमारे ऋषियों ने जब वेद और मंत्रों की रचना की तो उनका उद्देश्य मंत्र और साधना को जीवन में जोड़ना था।
ऋषि केवल साधना करने वाले अथवा जंगलों में आश्रम बनाकर रहने वाले व्यक्ति नही थे, वे उस युग के वैज्ञानिक, चिकित्सक, अध्यापक, राजनीतिज्ञ, कलाकार व्यक्तित्व थे। उन्होंने जो लिखा वह पूर्ण शोध और अनुसंधान से युक्त था।

किसी भी मंत्र का अभ्यास करते समय यदि कुछ नियमों का पालन किया जाये, तो साधक को सफलता निश्चित रूप में मिल सकती है -

सर्वप्रथम आपने जिस मंत्र का भी चयन किया है, उसकी सम्पूर्ण साधना-प्रक्रिया की जानकारी होना नितांत आवश्यक है। यह सत्य है की साधनाओं की जो शास्त्र वर्णित विधि है, उसमे रंचमात्र त्रुटी भी विनाशकारी हो सकती है, साथ ही इस शास्त्र वर्णित विधि में किसी प्रकार का संशोधन स्वयं करना भी उचित नहीं है।

वैसे अधिकतर साधनाओं में पूर्ण शुद्धता, सात्विकता तथा प्राण प्रतिष्ठित सामग्री के प्रयोग का विधान होता है, जबकि कुछ साधनाओं जैसे कर्णपिशाचिनि साधना, घन्टाकर्ण साधना, स्वप्न कर्णपिशाचिनि साधना तथा श्मशान में की जाने वाली समस्त प्रकार की साधनाओं में कुछ क्रियाओं का निषेध व कुछ का विशेष विधान है। इस प्रकार मंत्र साधना की असफलता का सर्वप्रथम कारण सही विधि का निर्धारित ज्ञान न होना है।

एक अन्य ध्यान देने योग्य विषय है - मंत्र का सही व शुद्ध उच्चारण। किसी भी मंत्र का जप प्रारम्भ करने से पूर्व समस्त संधियों को अच्छी प्रकार समझ लें। उच्चारण शुद्ध न होने पर मंत्र शक्ति का वांछित लाभ प्राप्त नहीं होता। मंत्र का जप पूर्ण स्पष्ट व दृढ़ स्वर में किया जाना चाहिए।

जहा तक संभव हो, पूजा-स्थल एकांत में होना चाहिये, जहां की साधना काल में कोई व्यवधान न पड़े।

एक बात सदैव याद रखें, की जिस किसी भी मंत्र का जप आप करते हैं, तो उस पर आस्था, पूर्ण विश्वास रखें। यदि आपको मंत्र और इसकी शक्ति में लेश मात्र भी शंका है व इसकी शक्ति पर पूर्ण आस्था नहीं है, तो आप निर्धारित जप संख्या का दस गुना रूप भी कर लें, तब भी यह निष्फल ही रहेगा।

मंत्र के उच्चारण के समय को एकाग्र रखने की परम आवश्यकता होती है। यदि मंत्र जपते समय विचार स्थिर है, ध्यान पूर्ण एकाग्र है और मंत्र की शक्ति पर पूर्ण आस्था है, तो असफलता का कोई कारण निर्मित ही नहीं होता है।

मंत्र जप आरम्भ करते समय पहले से ही साधना का उद्देश्य मन में रहना चाहिए। साधना के उद्देश्य को बराबर परिवर्तित करना सर्वथा अनुचित है।

उद्देश्य के साथ ही जप जप की संख्या का संकल्प भी प्रारम्भ में लेना चाहिये। जप की संख्या को पहले दिन से दूसरे दिन अधिक किया जा सकता है, किन्तु इसे कभी भी घटाना नहीं चाहिये। अपवाद स्वरुप एक-दो प्रकार की साधनाओं को छोड़कर।

एक ही मंत्र का जप लगातार करने से सम्बन्धित शक्ति जाग्रत रहती है। थोड़े समय तक एक मंत्र छोड़ देने और नये मंत्र प्रारंभ करने से पहले वाले मंत्र की शक्ति का ह्रास तो होता ही है और नये मंत्र को आपको फिर नये सिरे से शुरुआत करनी पड़ती है। पहले एक मंत्र को सिद्ध करना चाहिये, उसके पश्चात किसी अन्य को। एक मंत्र सिद्ध कर लेने पश्चात किसी दूसरे मंत्र को सिद्ध करना पहले मंत्र की तुलना में ज्यादा सरल होता है।

ज्यों-ज्यों आपकी साधना का स्तर बढ़ता जायेगा, सिद्धि की दुरुहता स्वतः ही कम होती जायेगी। किसी भी मंत्र की सिद्धि हेतु अव्रुतियों की जो शास्त्र वर्णित संख्या होती है, वह पहले से ही साधना की उत्तम पृष्ठभूमि रखने वाले साधकों के लिए ही मान्य है, नये साधक को इसका तिन गुना, चार गुना या इससे भी अधिक जप करना पड़ सकता है।

अंत में एक महत्वपूर्ण व ध्यान देने योग्य बात है की मंत्र साधना सही मुहूर्त में की जानी चाहिये। विभिन्न साधनाओं के लिए विभिन्न मुहूर्त निर्धारित है।

...किन्तु मुहूर्त की जटिलताओं से बचने के लिए कुछ मुहूर्त जिनको निश्चित रूप से समस्त साधनाओं हेतु उत्तम माना गया है, वे हैं - होली, दिपावली, शिवरात्री, नवरात्री। आप जिस किसी मंत्र का जप आरम्भ करना चाहते है, उसे इन अवसरों पर निर्धारित संख्या में जप कर उसका दशांश हवन कर लें।

इसके पश्चात् अपनी सुविधा के अनुसार जप कर सकते है। वैसे तो वर्षभर जप करना श्रेष्ठ है, किन्तु एक बार सिद्ध करने के पश्चात ११, २१, ५१ या १०८ की संख्या में जप करने से भी तुरन्त मनोवांछित फल प्राप्त होता है। आप किसी भी मंत्र का जप करते है, उसे वर्ष में एक बार उपरोक्त वर्णित अवसरों पर जाग्रत अवश्य करना चाहिये।

वैसे तो प्रत्येक साधना अपने-आप में अत्यन्त जटिल होती है, किन्तु यदि इन जटिलताओं से साधक बचना चाहे, तो सर्वश्रेष्ठ मार्ग है - 'योग्य गुरु का आश्रय प्राप्त करना'। गुरु के निर्देशानुसार साधना करते समय साधना की सफलता की संभावना शतप्रतिशत रहती है।

Some specific disease prevention spells, कुछ विशेष रोग निवारण मंत्र

कुछ विशेष रोग निवारण मंत्र
यों तो किसी भी समस्या के समाधान हेतु अनेको उपाय हैं। परन्तु मंत्रों के माध्यम से समस्या के निवारण के पीछे धारणा यह है कि मंत्र शक्ति एवं दैवी शक्ति के द्वारा साधक को वह बल प्राप्त होता है जिससे कि किसी भी समस्या का समाधान सहज हो जाता है। उदाहरण के लिए माना जाता है कि सभी रोगों का उदभाव मनुष्य के मन से ही होता है। मन पर पड़े दुष्प्रभावों को यदि मंत्र द्वारा नियंत्रित कर लिया जाए, तो रोग स्थाई रूप से शांत हो जाते हैं। उसी प्रकार मन को सुदृढ़ करके किसी भी समस्या पर आप विजय प्राप्त कर सकते हैं।

ब्लड प्रेशर तो स्थाई रूप से नियंत्रित हो सकता है... आप ख़ुद परख लीजिये न
क्या आप ब्लड प्रेशर के रोगी है, तो आप परेशान न हों, क्योंकि आपके पास स्वयं इसका इलाज है। यदि थोड़ी सी सावधानी बरत लें, तो फिर इसे आप आसानी से नियंत्रित कर सकते हैं। आप दवाओं के साथ यदि इस प्रयोग को भी संपन्न करें, तो फिर यह स्थाई रूप से नियंत्रित हो सकता है। मंत्रों में इतनी क्षमता होती है, कि यदि आप उनका प्रयोग उचित विधि से करें, तो वे पूर्ण फलप्रद होते ही हैं।

आप 'रोग निवारक मधूरूपेन रूद्राक्ष' लेकर उसे किसी ताम्रपात्र में केसर से स्वस्तिक बनाकर स्थापित करें। उसके समक्ष ४० दिन तक नित्य ७५ बार निम्न मंत्र का जाप करें, नित्य मंत्र जप समाप्ति के बाद रूद्राक्ष धारण कर लें -
मंत्र
॥ ॐ क्षं पं क्षं ॐ ॥
प्रयोग समाप्त होने के बाद रूद्राक्ष को नदी में प्रवाहित कर दें।

सबसे खतरनाक बिमारी है डायबिटीज और इसका समाधान यह भी है
डायबिटीज रोग कैसा होता है, यह तो इससे पीड़ित रोगी ही अच्छी तरह समझ सकते हैं। दिखने में तो यह सामान्य है, लेकिन जब यह उग्र रूप धारण कर लेता है, तो व्यक्ति अनेक प्रकार की बिमारियों से घिर जाता है तथा मृत्यु के समान कष्ट पाता है। इसी कारण इसको खतरनाक बिमारी कहा गया है। आप इस रोग का पूर्ण समाधान प्राप्त कर सकते है, यदि आप दवाओं के साथ साथ इस प्रयोग को भी संपन्न कर लें।

रविवार के दिन पूर्व दिशा की ओर मुख कर सफेद आसन पर बैठ जाएं। सर्वप्रथम गुरु पूजन संपन्न करे तथा गुरूजी से पूर्ण स्वास्थ्य का आशीर्वाद प्राप्त करें। इसके पश्चात सफेद रंग के वस्त्र पर कुंकुम से स्वस्तिक बनाकर उस पर 'अभीप्सा' को स्थापित करे दें, फिर उसके समक्ष १५ दिन तक नित्य मंत्र का ८ बार उच्चारण करें -
मंत्र
॥ ॐ ऐं ऐं सौः क्लीं क्लीं ॐ फट ॥
प्रयोग समाप्ति के बाद 'अभीप्सा' को नदी मैं प्रवाहित कर देन

आपने मस्तिष्क की क्षमता को पूर्ण विकसित करिए

आज का भौतिक युग प्रतियोगिताओं का युग है, जीवन के प्रत्येक क्षण मैं आपको अपनी श्रेष्ठता सिद्ध कराने के लिए विभिन्न प्रकार की प्रतियोगी परिस्थितियों का सामना करना पङता है जिस व्यक्ति का मस्तिष्क जितना अधिक क्रियाशील, क्षमतावान होता है, वह उतना ही श्रेष्टता अर्जित कर लेता है आप भी आपने मस्तिष्क की क्षमता को पूर्ण विकसित कर सकते हैं इस प्रयोग के माध्यम से -'चैत्यन्य यंत्र' को किसी भी श्रेष्ठ समय मैं धारण कर लें एवं नित्य पराठा काल आपने इष्ट का स्मरण कर निम्न मंत्र का १५ मिनट तक जप करें -
मंत्र
॥ ॐ श्रीं चैतन्यं चैतन्यं सदीर्घ ॐ फट ॥
यंत्र को ४० दिनों तक धारण किए रहे ४० दिन के पश्चात उसे नदी मैं प्रवाहित कर दे।

आपने अनिद्रा के रोग को इस प्रकार से समाप्त करिए

क्या कहा आपने, आप को नींद नहीं आती और और इसके लिए आपको रोज रात को नींद की गोली लेनी आवश्यक हो जाती है और फिर भी आप चाहते हुए चैन की नींद नहीं ले पाते आपको स्वाभाविक नींद लिए हुए कई माह बीत चुके हैं कहीं इस रोग के कारण आपका स्वास्थ्य तो प्रभावित नहीं हो रहा है आपका सौन्दर्य कहीं डालने तो नहीं लगा यह रोग आपके लिए हानिकारक, तो नहीं साबित हो रहा है यदि ऐसा है तो आप शीघ्र ही इससे छुटकारा प्राप्त कर लीजिये

आप किसी भी रात्री को स्नान कर सफेद वस्त्र मैं कुंकुम से द्विदल कमल बनाए, अपना नाम कुंकुम से लिखकर उस पर उस पर 'रोग मुक्ति गुटिका' को स्थापित करें नोऊ दिन तक गुटिका के समक्ष निम्न मंत्र का ग्यारह बार जप एकाग्र चित्त हो कर करें -
मंत्र
॥ ॐ अं अनिद्रा नाशाय अं ॐ फट ॥
जप समाप्ति के बाद शांत मन से लेट जायें और नौ दिन के पश्चात गुटिका को नदी में प्रवाहित करें।
मंत्र-तंत्र-यंत्र विज्ञान, जुलाई २००५

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