Tuesday, February 4, 2014

The method and moment of Saraswati Puja




आप सब को वसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं।।

सद्गुरुदेव एवं माँ सरस्वती आप सब को विद्या, बुद्धि और ज्ञान दें..

सरस्वती पूजा की संपूर्ण विधि और मुहूर्त
दिन बसंत पंचमी इस वर्ष 4 फरवरी को मनाया जा रहा है। इस दिन अगर आप भी मां सरस्वती की पूजा करके उन्हें प्रसन्न करना चाहते हैं तो इसके लिए शुभ मुहूर्त पूरे दिन है।

सरस्वती माता की पूजा करने वाले को सबसे पहले मां सरस्वती की प्रतिमा अथवा तस्वीर को सामने रखकर उनके सामने धूप-दीप और अगरबत्ती जलानी चाहिए।

||सरस्वती वंदना||

सरस्वती के एक मुख, चार हाथ हैं । मुस्कान से उल्लास, दो हाथों में वीणा-भाव संचार एवं कलात्मकता की प्रतीक है । पुस्तक से ज्ञान और माला से ईशनिष्ठा-सात्त्विकता का बोध होता है । वाहन मयूर-सौन्दर्य एवं मधुर स्वर का प्रतीक है।इनका वाहन हंस माना जाता है और इनके हाथों में वीणा, वेद और माला होती है ।
हिन्दू कोई भी पाठ्यकर्म के पहले इनकी पूजा करते हैं ।

रात्रि कालीन सरस्वती साधना ::-

या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।
या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥1॥

शुक्लां ब्रह्मविचार सार परमामाद्यां जगद्व्यापिनीं
वीणा-पुस्तक-धारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम्‌।
हस्ते स्फटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम्‌
वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम्‌॥2॥

सरस्वती यन्त्र और लाल मूंगा माला से जाप करे ..

ऊं गं गणेशाय नमः: 3 माला
ऊं ऐं सरस्वत्यै ऐं नमः : 3 माला
ऊं नमः निखिलेश्वरायै : 3 माला

विध्या की देवी, भगवती सरस्वती, कुन्द के फूल, चंद्रमा, हिमराशि और मोती के हार की तरह धवल वर्ण की हैं और जो श्वेत वस्त्र धारण करती हैं, जिनके हाथ में वीणा-दण्ड शोभायमान है, जिन्होंने श्वेत कमलों पर आसन ग्रहण किया है तथा ब्रह्मा, विष्णु एवं शंकर आदि देवताओं द्वारा जो सदा पूजित हैं, वही संपूर्ण जड़ता और अज्ञान को दूर कर देने वाली माँ सरस्वती हमारी रक्षा करें॥1॥

शुक्लवर्ण वाली, संपूर्ण चराचर जगत्‌ में व्याप्त, आदिशक्ति, परब्रह्म के विषय में किए गए विचार एवं चिंतन के सार रूप परम उत्कर्ष को धारण करने वाली, सभी भयों से भयदान देने वाली, अज्ञान के अँधेरे को मिटाने वाली, हाथों में वीणा, पुस्तक और स्फटिक की माला धारण करने वाली और पद्मासन पर विराजमान्‌ बुद्धि प्रदान करने वाली, सर्वोच्च ऐश्वर्य से अलंकृत, भगवती शारदा (सरस्वती देवी) की मैं वंदना करता हूँ/करती हूँ ॥2॥

जाप गुरु देव को समर्पित करे
Guru Paduka Stotram By Bhagawat Pada Adi Sankara

अनंत संसार समुद्र तार नौकयीताभ्याम गुरुभक्तीदाभ्याम
वैराग्य साम्राज्यद पूजनाभ्याम नमो नमः श्री गुरु पादुकाभ्याम || 1
कवित्व वाराशी निशाकराभ्याम दौर्भाग्य दावाम्बुद मालीकाभ्याम
दुरी कृता नम्र विपत्तीताभ्याम नमो नमः श्री गुरु पादुकाभ्याम || 2

नता ययोहो श्रीपतीताम समियुः कदाचीदप्याषु दरिद्र्यवर्याहा
मूकाश्च वाचस्पतीताहिताभ्याम नमो नमः श्री गुरु पादुकाभ्याम || 3
नालिक नीकाश पदाह्रीताभ्याम ना ना विमोहादी निवारीकाभ्याम
नमत्ज्ज्नाभिष्ट ततीप्रदाभ्याम नमो नमः श्री गुरु पादुकाभ्याम || 4
नृपाली मौली व्रज रत्न कांती सरीत द्विराजत झशकन्यकाभ्याम
नृपत्वादाभ्याम नतलोकपंक्तेहे नमो नमः श्री गुरु पादुकाभ्याम ||5
पापान्धाकारार्क परम्पराभ्याम त्राप त्रयाहीन्द्र खगेश्वराभ्याम
जाड्याब्धी समशोषण वाडवाभ्याम नमो नमः श्री गुरु पादुकाभ्याम || 6
श्मादी षटक प्रदवैभवाभ्याम समाधी दान व्रत दिक्षिताभ्याम
रमाधवाहीन्ग्र स्थिरभक्तीदाभ्याम नमो नमः श्री गुरु पादुकाभ्याम || 7
स्वार्चापराणाम अखीलेष्टदाभ्याम स्वाहा सहायाक्ष धुरंधराभ्याम
स्वान्तच्छभाव प्रदपूजनाभ्याम नमो नमः श्री गुरु पादुकाभ्याम || 8
कामादिसर्प व्रज ग़ारुडाभ्याम विवेक वैराग्य निधी प्रदाभ्याम
बोधप्रदाभ्याम द्रुत मोक्षदाभ्याम नमो नमः श्री गुरु पादुकाभ्याम || 9

Thursday, January 2, 2014

kundali jagran mantra part-3 manipur chakra

कुंडलिनी जागरण मन्त्र प्रयोग भाग 3 अमृत सिद्धि(मणिपुर चक्र विभेदनं):


  • ॐ गं गणेशाय नमः
  • ॐ  ऐं सरस्वत्यै ऐं नमः 
  •  ॐ नमः निखिलेश्वरायै : 


अमृत सिद्धि(मणिपुर चक्र विभेदनं): मणिपुर चक्र को योग, साधना, तंत्र सिद्धि, प्रत्यक्षिकरण, देह सिद्धि, पद्मासन सिद्धि, खेचरत्व पद प्राप्ति,सूक्ष्म शरीर जागरण व विचरण एवं और भी बहुत सारी उपलब्धियों की प्राप्ति में सर्वोपरि स्थान प्राप्त है। इस चक्र के जागरण या भेदन के पश्चात् शरीर पूर्ण रूपेण सिद्ध हो जाता है। क्षुधा कम लगती है यानि के आप को अत्यंत ही अल्प आहार की आवश्यकता होती है। प्राण शक्ति का यही उद्गम बिन्दु है। अत: इस चक्र के भेदन के पश्चात आप कोई भी साधना कर लें सिद्धि सुनिश्चित रूप से प्रथम बार में ही साधक के गले में वरमाला डालने को बाध्य हो जाती है। ऐसा शास्त्रों में उल्लिखित है। सदगुरुदेव ने इस स्तोत्र का उल्लेख अपनी एक पुस्तक में रोग मुक्ति के संदर्भ में किया है। जिसमें साधक को इस स्तोत्र के नित्य 108 पाठ 21 दिनों तक भगवान शिव के समक्ष उनकी सुविधानुसार पूजन कर करना चाहिए। हवन आदि की आवश्यकता नहीं है। बाकि उपरोक्त वर्णित लाभों में से कुछ तो फलश्रुति में वर्णित हैं और बाकि योग ग्रंथों में। इस स्तोत्र को मैं फलश्रुति के साथ दे रहा हूं। पहला पाठ फलश्रुति के साथ करें। बीच के सभी पाठ में मूल स्तोत्र का ही पाठ करें और पुन: अंतिम पाठ फलश्रुति के साथ करें। कोशिश करें यदि आप एक मूल पाठ एक श्वास में कर पाएं तो या फिर दो सांस में करें। 2—3 दिनों के अभ्यास से ही ये संभव हो जाएगा। गहरी श्वास लें और पाठ प्रारंभ करें। 1 या 2 श्वास में मूल पाठ को संपन्न करें। श्वास का नियम फलश्रुति के लिए नहीं है। पहले गुरु, गणेश, गौरी और भैरव का पूजन कर लें। सदगुरुदेव से आज्ञा लेकर इस साधना में प्रवृत्त हों।यदि आपके पास शिवलिंग या महामृत्युजय यंत्र हो तो उसका पूजन करें या भगवान श्री निखिल या श्रीशिव के चित्र के सामने भी कर सकते हैं। रोग की गंभीरता को देखता हुए आप पाठ की संख्या में वृद्धि कर लें। और उपरोक्त वर्णित लाभों की प्राप्ति के लिए इस स्तोत्र को नित्य 1100 बार जिसमें आपको कुल 5—6 घंटे लगेंगे, करें। इसमें समय सीमा का उल्लेख नहीं है परंतु साधक को स्वत: ही पता चलने लगता है कि उसे किन किन उपलब्धियों की प्राप्ति हो रही है और कितने समय में उसे पूर्ण सिद्धि प्राप्त हो सकती है। इसमें शब्दों का उच्चारण शुद्ध करें। क्योंकि मणिपूर का विभेदन इस स्तोत्र के ध्वनि विज्ञान पर आधारित है।

मणिपूर विभेदकम् स्तोत्रम् मूल पाठ:


ऊँ नम: परमकल्याण नमस्ते विश्वभावन।
 नमस्ते पार्वतीनाथ उमाकान्त नमोस्तुते।।
 विश्वात्मने अविचिन्त्याय गुणाय निर्गुणाय च।
 धर्माय ज्ञानमक्षाय नमस्ते सर्वयोगिने।
 नमस्ते कालरूपाय त्रैलोक्यरक्षणाय च।।
 गोलोकघातकायैव चण्डेशाय नमोस्तुते।
 सद्योजाताय नमस्ते शूलधारिणे।।
 कालान्ताय च कान्ताय चैतन्याय नमो नम:।
 कुलात्मकाय कौलाय चंद्रशेखर ते नम:।। 
उमानाथ नमस्तुभ्यम् योगीन्द्राय नमो नम:। 
सर्वाय सर्वपूज्याय ध्यानस्थाय गुणात्मने।
 पार्वती प्राणनाथाय नमस्ते परमात्मने।। 
फलश्रुति: एतत् स्तोत्रं पठित्वा तु स्तौति य: परमेश्वरं। 
याति रुद्रकुलस्थानं मणिपूरं विभिद्यते।। 
एतत् स्तोत्रं प्रपाठेन तुष्टो भवति शंकर:।
 खेचरत्व पदं नित्यं ददाति परमेश्वर:।


अंत में सर्वसिद्धिप्रदाता प्रभु श्रीनिखिलेश्वर से ये प्रार्थना करता हूँ कि वे अपनी असीम अनुकम्पा समस्त शिष्यों और साधकों पर बरसायें और उन्हें मनोनुकूल सिद्धियां प्रदा करें उनका कल्याण करें। ।। श्रीनिखिल पादारविन्दार्पणमस्तु ।।

kundali jagran mantra part-2 by GUNJARANN KRIYA

कुंडलिनी जागरण मन्त्र प्रयोग भाग 2
ऊं गं गणेशाय नमः: ऊं ऐं सरस्वत्यै ऐं नमः : ऊं  नमः निखिलेश्वरायै :
GUNJARANN KRIYA
Gunjaran is a technique in Kriya Yog.Gunjaran has two aspects - One is Shank method and other is called as Soham method.These two techniques are further divided into Samaanya Gunjaran and Advanced Gunjaran.
Now,coming back to Shank and Soham methods -- In Shank Samaanya Gunjaran method , an " uoooo" sound like that of blowing a Shank is produced by mouth without stopping breath .This initially can be done only for 1 minute or so. Now ,when the sadhak becomes successful in doing Samaanya Shank Gunjaran for 8 minutes, he or she has to close all openings of the body which includes two eyes, two ears,two nostrils,guda,linga and naabhi You have to sit with your left foot covering Guda,and right leg touching the ling area.Then you have to close your ears with thumbs and eyes with indexfinger.Close your nose with middle finger.Keep ring and small fingers on mouth.This mudra is called as Shambavi mudra.Take air through your mouth and start aantharik Gunjaran.This is Advanced Gunjaran.Then the sadhak's body develops heat and rises in air above ground level.On reaching 8 minutes gunjaran a sadhak enters samadhi automatically.
Dhyaan leads to samaadhi. Dhaarana means the sadhak places Guru in the Third Eye or Agya Chakra
Now coming to Soham Method the same process of initial Samaanya Gunjaran and Advanced Gunjaran have to be repeated with the mantra SOHAM.
Initialy it will be difficult to continue gunjaran without breath stopping.But Gurudev tells that if you are able to do 1 minute gunjaran you can accomplish 32 minute gunjaran also which is the perfect state.It is similar to the fact that if an aeroplane can fly 2 feet high,it can go 100 feet also
So the sadhak rises above gravity with all chakras activated at the same time and this results in Sahasraar Jaagran. Gunjarana Kriya is done to reach samadhi state. This results in Poornna Kundalini Jaagrann,which is never possible by normal Kundalini Jaagran technique in a single step,since all seven chakras have to be activated separately and if Kundalini misses the path it will result in mental imbalance of the person.
Gurudev has told that doing Gunjaran Kriya daily for 30 minutes is the best Guru dakshinna a disciple can offer me.Also Guruji tells that If Kundalini Jaagran is 10th standard, Gunjaran Kriya yog is M.A level Hence all disciples should do daily Gunjaran Kriya

kundali jagran mantra part-1

कुंडलिनी जागरण मन्त्र प्रयोग भाग १
ऊं गं गणेशाय नमः: ऊं ऐं सरस्वत्यै ऐं नमः : ऊं नमः निखिलेश्वरायै :
कुन्डलिनी [ Kundalini ] जागरण साधनात्मक जीवन का सौभाग्य है.
विशेष तथ्य :-
कुन्डलिनी जागरण साधनात्मक जीवन का सौभाग्य है. कुन्डलिनी जागरण साधना गुरु के सानिध्य मे करनी चाहिये. यह शक्ति अत्यन्त प्रचन्ड होती है. इसका नियन्त्रण केवल गुरु ही कर सकते हैं. यदि आपने गुरु दीक्षा नही ली है तो किसी योग्य गुरु से दीक्षा लेकर ही इस साधना में प्रवृत्त हों. यदि गुरु प्राप्त ना हो पाये तो आप मेरे गुरु जी Gurudev Dr. Narayan Dutt Shrimaliji (परमहंस स्वामी निखिलेश्वरानद जी )को गुरु मानकर उनसे मानसिक अनुमति लेकर जाप कर सकते हैं .
साधना सामग्र्री
चेतना यन्त्र , चेतना माला , रुद्राक्ष माला , या गुरुमाला
आसन , पीला , सफ़ेद ऊनी कम्बल
पंचौपचार गुरु पूजन करे फिर गुरु मंत्र का ४ माला करे
हरी ॐ ..........................की ध्वनि करे जब तक साँस साथ दे , 1 se 5min तक करे
तंत्र साफल्य मंत्र की ५ माला जाप करे तंत्र साफल्य मंत्र है:::
ॐ ह्रीं ऐं क्रीं क्रीं हुं हुं क्रीं क्रीं फट [om hreem aiem kreem kreem hum hum kreem kreem phat].
यह मंत्र आपको "तंत्र रहस्य" नामक CD मे स्वयं सदगुरुदेव की ओजस्वी वाणी मे मिल जाएगा।
फिर ये मंत्र जाप जाप करे साधना मंत्र
|| ॐ ह्रीं मम प्राण देह रोम प्रतिरोम चैतन्य जाग्रय ह्रीं ॐ नम: ||
यह एक अद्भुत मंत्र है. इससे धीरे धीरे शरीर की आतंरिक शक्तियों का जागरण होता है और कालांतर में कुण्डलिनी शक्ति जाग्रत होने लगती है. प्रतिदिन इसका 11, 21 mala की संख्या में जाप करें. जाप करते समय महसूस करें कि मंत्र आपके अन्दर गूंज रहा है.
मन्त्र जाप के अन्त में कहें :- ना गुरोरधिकम,ना गुरोरधिकम,ना गुरोरधिकम शिव शासनतः,शिव शासनतः,शिव शासनतः
निखिल पंचकम ka path kare 1, ya 5 baar...
आदोवदानं परमं सदेहं, प्राण प्रमेयं पर संप्रभूतम । पुरुषोत्तमां पूर्णमदैव रुपं, निखिलेश्वरोयं प्रणम्यं नमामि ॥ १॥
अहिर्गोत रूपं सिद्धाश्रमोयं, पूर्णस्वरूपं चैतन्य रूपं । दीर्घोवतां पूर्ण मदैव नित्यं, निखिलेश्वरोयं प्रणम्यं नमामि ॥ २॥
ब्रह्माण्ड्मेवं ज्ञानोर्णवापं,सिद्धाश्रमोयं सवितं सदेयं । अजन्मं प्रवां पूर्ण मदैव चित्यं, निखिलेश्वरोयं प्रणम्यं नमामि ॥ ३॥
गुरुर्वै त्वमेवं प्राण त्वमेवं, आत्म त्वमेवं श्रेष्ठ त्वमेवं । आविर्भ्य पूर्ण मदैव रूपं, निखिलेश्वरोयं प्रणम्यं नमामि ॥ ४॥
प्रणम्यं प्रणम्यं प्रणम्यं परेशां,प्रणम्यं प्रणम्यं प्रणम्यं विवेशां । प्रणम्यं प्रणम्यं प्रणम्यं सुरेशां, निखिलेश्वरोयं प्रणम्यं नमामि ॥ ५॥

how do the mala jaap

माला - संबंधी सावधानी माला फेरते समय निम्न सावधानियां बरतनी आवश्यक हैं - माला सदा दाहिने हाथ में रखनी चाहिए । माला भूमि पर नहीं गिरनी चाहिए , उस पर धूल नहीं जमनी चाहिए । माला अंगूठे , मध्यमा व अनामिका से फेरना ठीक है । दूसरी उंगली तर्जनी से भूलकर भी माला नहीं फेरनी चाहिए । मनकों पर नाखून नहीं लगने चाहिए । माला में जो सुमेरु होता है , उसे लांघना नहीं चाहिए । यदि दुबारा माला फेरनी हो तो वापस माला बदलकर फेरें । मनके फिराते समय सुमेरु भूमि का कभी स्पर्श न करे । इस बात के प्रति सदा सावधान रहना चाहिए ।

nav grah dos mukti mantra

nav grah dos mukti mantra ॐ सं चं भं बुं ब्रं शुरं शं रां कें ॐ 11 mala parday  hakik mala se nav grah yantra 
ke samne karne se dos mukt ho jata hai


Thursday, September 19, 2013

ye kesi parikesha ये कैसी परिक्षा स्वामी प्रेम आनन्द

ये कैसी परिक्षा-----स्वामी प्रेम आनन्द 

आज गुरु जी आश्रम में ही है, मगर ज्यादा लोगो को मालूम ना होने के कारण भीड़ बहुत कम है! सब लोग दोपहर का भोजन करके आराम कर रहे थे, इसलिए ना बाहर ज्यादा भीड़ थी और ना ही अंदर! मेरे पास गुरु जी का सन्देश आया कि आनन्द तुम्हे गुरूजी बुला रहे है! मै गुरूजी के पास ऊपर गया तो गुरु जी बड़े अच्छे मुड में बैठे थे...और जब गुरूजी अच्छे मुड में होते है तो कुछ ना कुछ शरारत जरुर करते है!
मै थोडा सावधान हो गया...चरण स्पर्स करके बैठ गया! थोड़ी देर गुरूजी इधर-उधर की बात करते रहे फिर बोले--आनन्द नीचे एक लड़का आया है ...ये लड़का सही नहीं है इसके एक थप्पड़ मार कर आश्रम के बाहर निकाल देना, और गेट बंद कर देना ताकि ये यहाँ ना आये! ये काम मेरे लिए बहुत कठिन था, किसी से मारपीट करना मुझे जरा भी नहीं सुहाता...मगर अब में क्या करू?
मैंने कहा--जी प्रभु, में बिना मारे उसको बाहर निकाल दूँ!
गुरूजी नहीं--वो थप्पड़ की भाषा ही समझता है!
मैंने कहा--जी प्रभु! और मै नीचे आ गया!
नीचे आकर जब मैंने उस लड़के को देखा तो मेरी हिम्मत जवाब दे गई, ये लड़का तो मुझसे बहुत प्रेम करता है और बहुत अच्छा लड़का है...अब मै करू तो क्या करू? मै समझ गया कि गुरूजी ने परिक्षा का खेल शुरू कर दिया है! अब मै उसे थप्पड़ मरता हूँ तो भी पाप और ना मारू तो भी पाप.....करू तो क्या करू, मै गुरु चित्र के सामने ध्यान लगा कर प्रार्थना करने लगा कि प्रभु मुझे रास्ता दिखाओ कि मै इस परिक्षा में पास हो जाऊ!
अचानक मुझे ख्याल आया और मैंने मन ही मन गुरूजी से कहा—प्रभु मेरी अंतर आत्मा इस लड़के से गलत व्यवहार करने के लिए तैयार नहीं है, मगर मै केवल आपकी आज्ञा का ही पालन कर रहा हूँ इसलिए चाहे ये पाप हो या पुन्य सारी जिम्मेदारी केवल आपकी होगी ...मेरी नहीं, क्योकि मै दिल से तो इस लड़के के थप्पड़ मरना ही नहीं चाहता! अब मै लड़के के पास गया, तो लड़का मुझे देखकर बहुत खुश हुआ और बोला कैसे हो आनन्द जी?
मैंने उससे कहा--- तुम इसी वक्त आश्रम से बाहर चले जाओ....
लड़का—क्या बात हो गई आनन्द जी..आप गुस्से में क्यों है?
मैंने कहा—बकवास नहीं करना और तुरंत यहाँ से चले जाना ....
लड़का ----आप मुझे आश्रम से ऐसे-कैसे निकाल सकते हो?
मैंने अपना मन मजबूत किया और उसके एक धीरे से थप्पड़ लगा दिया और पकड़ कर गेट पर ले गया और बाहर निकाल कर गेट बंद कर दिया! मैंने चुपचाप उस लड़के को देखा तो उसकी आँखों में आंसू थे....मै भी नीचे हाल में जाकर बहुत रोया---कि प्रभु ये किसी परिक्षा...........
दूसरे दिन उसी लड़के का फोन आया और बोला—आनन्द जी मै रात भर सो नहीं सका हूँ बस मुझे इतना बतादो कि मेरा कसूर क्या था? मैंने कहा---तुम्हारा कोई कसूर नहीं था, ये गुरूजी ने मुझे आज्ञा दी थी..मैंने बहुत मजबूर होकर ऐसा किया, मुझे माफ कर देना....मैंने ये भी कहा—कि ये मेरी और तुम्हारी हम दोनों की परिक्षा थी..जो तुमने भी प्रतिक्रिया न करके पास करली और मैंने भी अपना ह्रदय गुरु जी के सामने खोल दिया....और अपना सच गुरु जी को बताकर मैंने भी ये परिक्षा पास करली....अब तुम चिंता ना करो, जब मन करे यहाँ आना!
नोट—प्रिय बन्धुओ हमारी मानवता को परखने के लिए गुरुदेव कैसी-कैसी परिक्षा लेते थे, मै आपको क्या बताऊ, गुरु का कर्तव्य है कि वो शिष्य की परिक्षा और शिष्य का भी कर्तव्य होता है कि वो परिक्षा दे और उसमे पास हो! गुरु को जितनी प्रसंसा स्वयं के हारने की होती है उतना ही दुःख स्वयं के जीतने का भी होता है! इसलिए मै आप सभी को सचेत करना चाहता हूँ कि आप सब सावधानी पूर्वक संसार में सबसे व्यवहार करे....क्योकि यहाँ हर दिल में गुरुदेव विराजमान है.....ये सौ प्रतिसत सत्य बोल रहा हूँ!
समाप्त